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Saturday, 10 September 2016

सारी दुनिया की नज़र में इस्लाम को बदनाम किया जा रहा,वही पश्चिमी हज में इस्लाम की तरफ बढ़ता सबका रुझान।

रियाद: इस्लामी उग्रवाद, आतंकवाद और शिया, सुन्नी मसलकी मतभेद के परिणामस्वरूप इस्लामी दुनिया में जारी रक्त्पात के परिणामस्वरूप जहां पूरी दुनिया में इस्लाम और मुसलमानों के बारे में नकारात्मक सोच को बढ़ावा देने में वृद्धि हुई है वहीं हज इस अध्याय में हवा का एक ताजा झोंका है जो पश्चिम को भी इस्लामी सहिष्णुता को स्वीकार करने पर मजबूर किया है।Facebook पे हमारे पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करियेअल अरबिया डॉट नेट के अनुसार अहले मगरिब जो मुसलमानों को केवल युद्ध और चरमपंथ के प्रतीक के रूप पर पेश करते हुए इस्लामोफोबिया से पीड़ित हैं हज जैसे वैश्विक सभा के लाभ को स्वीकार करने लगे हैं।पश्चिमी दुनिया के दो प्रमुख शोधकर्ता माइकल इलैकज्यो और स्टीफन जीमिकोफ संयुक्त रूप से एक रिपोर्ट तैयार की है जो हज के मानव समाज पर लागू होने वाले प्रभाव का बारीकी से विश्लेषण किया गया है। ” मक्का मुकर्रमा, धर्म और नए आधार पर समाजी संरेखण ” शीर्षक सेतैयार की गई रिपोर्ट में इस सवाल पर बहस की गई है कि क्या इस्लामी रिवाज विशेषकर हज जैसा विश्व सभा मानव सहिष्णुता में कोई भूमिका अदा कर सकता है? विशेषज्ञों ने खुद ही इस सवाल का जवाब सकारात्मक दिया है और स्वीकार किया है कि हर साल जमीन के विभिन्न क्षेत्रों से संबंधित, अलग अलग भाषे बोलने वाले, काले और सफेद, विभिन्न साम्प्रदायिक विचारधारा युक्त दो मिलियन लोगों का एक जगह एक ही पोशाक, एक ही मक़सद और एक ही तरीके में रस्म व रिवाज को अदा करना पूरी दुनिया में मानव सहिष्णुता का सबसे बड़ा और अनूठा उदाहरण है। नि:संदेह हज की भीड़ सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और मानवीय और इस्लामी सहिष्णुता के इस्लामी दर्शन पर मुहर सत्यापित लगी है क्योंकि दुनिया का कोई दूसरा धर्म ऐसी वैश्विक सहिष्णुता की कोई मिसाल पेश करने में असमर्थ है। हज की सभा इस बात का संदेश है कि आदम के बच्चों में धर्म, रंग, जाति और संप्रदाय के आधार पर कोई अंतर नहीं है और सभी मनुष्य बराबर हैं। तथा कहा किहज की सभा इस्लाम और दुनिया के दुसरे क्षेत्रों में पाई जाने वाले साम्प्रदायिक संघर्ष को हतोत्साहित करते हुए पूरी मानवता को एक सूत्र में पिरोने की दावत प्रदान करता है।

मेरे खिलाफ रची जा रही साजिश,भारतीय मुसलमानो पर हमला :जाकिर नाईक

इस्लामिक स्कॉलर जाकिर नाईक ने एक ख़त लिखकर उनके और उनके संघठनो के खिलाफ हो रही जाँच कोसाजिश बताया और इस तरह की हरकतों को पुरे भारतीय मुस्लिमो पे हमला बताया .Facebook पे हमारे पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करियेअपने इस ओपन लेटर में जाकिर नाइक ने इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन पर बैन केवल उनके लिए नहीं बल्कि भारत के 20 करोड़ मुसलमानों के खिलाफ अन्याय है. सरकार के इस कदम को नाइक ने शांति, लोकतंत्र व न्याय पर हमला करार दिया है. नाइक ने कहा कि उनके संगठन पर प्रतिबंध वाला कदम मुख्यधारा से कटे हर तत्वको अपने मनमुताबिक कदम उठाने को प्रेरित करेगा.खुद को मुसलमानों के बीच सबसे बड़ा और लोकप्रिय व्यक्ति बताते हुए नाइक ने लिखा हैकि अगर आप मुस्लिम समुदाय के ‘इस’ शख्स को नीचा दिखाएंगे और उसे शैतान के रूप में पेश करेंगे तो बाकी सब बिल्कुल आसान हो जाएगा. इसलिए जो भी हो रहा है वह एक साजिश है, और इसको करने की कोई वजह नहीं दिख रही.

Tuesday, 6 September 2016

पकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाने वाले हुर्रियत से सरकार बंद करे बातचीत :उलेमा

मुस्लिम उलेमाओ का एक समूह आज भारत के गृहमंत्री राजनाथ सिंह से मुलाक़ात की ,इन लोगो ने कश्मीर मसले पर भी गृहमंत्री से बात की .मीटिंग के बाद मौलवियों ने एक सुर में कहा किकेंद्र सरकार को कश्मीर की स्थिति सुधारने के लिए अलगाववादियों से बातचीत नहीं करनी चाहिए.मिलने के बाद उलेमाओ ने कहा , ‘हुर्रियत के लोगों से बातचीत क्यों हो? ये वे लोग हैं जो ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारे लगाते हैं।’इसके साथ ही सभी मौलवियों ने उन लोगों पर भी सवाल खड़े किए जो अलगाववादियों से मिलने के लिए गए थे. मौलवियों ने कहा कि उन लोगों को अलगाववादियों से बातचीत करने जाना ही नहीं चाहिए था.

जब कानून सबके लिए बराबर तो मोदी राज में क्यूं नहीं है सुप्रीम कोर्ट में एक भी मुस्लिम जज

हाल ही में हुए एक सर्वे के मुताबिक़ की सुप्रीम कोर्ट में एक भी मुस्लिम जज नहीं है। आखिरी बार 2012 में सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम जज की नियुक्ति की गई थी। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक जस्टिस एम.वाई.इकबाल और जस्टिस फकीर मोहम्मद 2012 में जज बने थे जोकि इस साल रिटायर हो गए हैं। पिछले 11 वर्षों में ऐसा पहली बार और पिछले करीब तीन दशकों में ऐसा दूसरी बार हुआ है कि देश की सुप्रीम कोर्ट में कोई मुस्लिम जज नहीं है। हालांकि कहा जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार के बीच हाईकोर्ट्स में जजों कीनियुक्ति को गतिरोध के चलते काफी देरी लग रही है। गौरतलब है कि जजों की नियुक्ति में देरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के प्रति अपनी नाराजगी भी जाहिर की है। आपको दें कि सुप्रीम कोर्ट की पहली महिला जस्टिस एम. फातिमा बीवी जज भी एक मुस्लिम थीं जोकि 6अक्टूबर 1989 से 29 अप्रैल 1992 तक सुप्रीम कोर्ट में जज थीं। सुप्रीम कोर्ट सेरिटायर हो चुके 196 और मौजूदा 28 जजों में कुल 17 (7.5 प्रतिशत) जज मुस्लिम रहे ह

मस्जिद तामीर या मरम्मत में किसी ग़ैर मुस्लिम का पैसा नहीं लग सकता!

अयोध्या : पिछले दिनों सावन मेले के दौरान मंदिर की छत गिरने के बाद हुए हादसे के चलते प्रशासन ने ऐसी जर्जर इमारतों को नोटिस जारीकिया है कि या तो उनकी मरम्मत कराई जाए या फिर उन्हें गिरा दिया जाए. आलमगीरी मस्जिद के लिए भी इसी के तहत नोटिस जारी किया गया है.लेकिन हाजी महबूब कहते हैं कि यदि महंत ज्ञानदास वास्तव में हिन्दू मुस्लिम भाईचारे की मिसाल पेश करना चाहते हैं तो उन्हें यह ज़मीन और मस्जिद मुसलमानों को सौंप देनी चाहिए. नुमानगढ़ी स्थित आलमगीरी मस्जिद की जर्जर इमारत को महंत ज्ञानदास ने ठीक कराने का फ़ैसला किया और उस पर काम भी शुरू करा दिया. लेकिन कुछ मुस्लिम संगठनों ने इस पर आपत्ति जताई है. हाजी महबूब का आरोप है कि महंत ज्ञानदास ऐसा सिर्फ़ पब्लिसिटी के लिए कर रहे हैं और अक़्सर ऐसे काम करते हैं ताकि उन्हें पब्लिसिटी मिलती रहे, लेकिनमस्जिद की मरम्मत या उससे जुड़ा कोई काम करने की मुस्लिम समाज उन्हें इजाज़त नहीं देगा.बताया जाता है कि 17वीं शताब्दी में इस मस्जिद को मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब के किसी सेनापति ने बनवाया था. बाद में अवध के नवाब शुजाउद्दौला ने ये जगह मंदिर बनाने के लिए हनुमानगढ़ी मंदिर ट्रस्ट को दे दी. मस्जिद में लगातार नमाज़ भी होती रही.लेकिन हाल ही में जिला प्रशासन ने कानूनी तौर पर हनुमानगढ़ी ट्रस्ट को इस पूरे परिसर और भवन का स्वामी मानते हुए मस्जिद से सटी जर्जर दीवार को गिरा देने या मरम्मत कराने का नोटिस दिया है. उसी आधार पर मस्जिद के सामने जमीन पर बने चबूतरे और दीवार का निर्माण कार्य कराया जा रहा है.इस बारे में महंत ज्ञानदास से उनका पक्ष जानने की कोशिश की गई लेकिन उनसे बात नहीं होसकी. उनके इस प्रयास की तारीफ़ भी हो रही है, लेकिन हाजी महबूब के अलावा ऐसे और भी कई संगठन हैं जो कि महंत ज्ञानदास के इस क़दम काविरोध कर रहे हैं.बहरहाल मस्जिद से सटी दीवार के जीर्णोद्धार का काम शुरू हो गया है. महंत ज्ञानदास बाबरी मस्जिद के अहम पक्षकार हाशिम अंसारी के साथ मंदिर-मस्जिद विवाद का हल ढ़ूूंढने के मामलेमें भी काफी प्रयास कर चुके हैं.

Sunday, 4 September 2016

आखिर मुस्लिम क़ौम इतनी बड़ी तादाद में अनपढ़ क्यों?

दिल्ली : मुस्लिम क़ौम के बारे में भारत में इतनी रिपोर्ट आ चुकी फिर भी मुस्लिम क़ौम इनसे अंजान बने फिर रहे हैं, चाहे वो सहचर की रिपोर्ट हो या फिर कोई और रिपोर्ट अब खबर आ गई कि भारत में सबसे अधिक अनपढ़ भी मुस्लिम हीहैं. लेकिन क्यों? भारत के मुसलमानों का दीन और दुनिया के बीच जो सामंजस्य बिठाना चाहिए था वह उतना अच्छा नहीं है जितना अन्य देशों में है. शायद उनके पिछड़ेपन की वजह भी यही है. इसीलिए 2011 की जनगणना के जो आंकड़े आ रहे हैं उनमें मुसलमानों के पिछड़ेपन की कहानी कुछ ज्यादा ही नुमायां हो रही है. अभी इस खबर को गुजरे ज्यादा दिन भी नहीं हुए थे कि भारत का हर चौथा भिखारी मुस्लिम है, अब यह खबर आ गईकि भारत में सबसे अधिक अनपढ़ भी मुस्लिम ही हैं. जनगणना के ताजा आंकड़े बताते हैं कि भारतमें 42.72 प्रतिशत से अधिक मुसलमान अनपढ़ हैं और सबसे कम निरक्षर सिर्फ 13.57 फीसदी जैन समुदाय के लोग हैं. यह भी अजीब इत्तेफाक है कि सबसे कम पढ़े लिखे और सबसे अधिक पढ़े लिखे, दोनों ही अल्पसंख्यक हैं. देश में 25.7 प्रतिशत जैन समुदाय के लोग ग्रैजुएट हैं जबकि मुसलमानों में इनका फीसद सिर्फ 2.8है. ईसाइयों में 8.8 फीसदी लोग ग्रैजुएट हैंऔर सिक्ख 6.4 प्रतिशत ग्रैजुएट हैं.भारत की आबादी में मुसलमान 14.23 फीसदी हैं जबकि भिखारियों की आबादी में उनकी हिस्सेदारी 24.9 प्रतिशत बनती है. सच्चर आयोग की रिपोर्ट पहले ही बता चुकी है कि भारतमें मुसलमानों की हालत दलितों से भी बदतर हो चुकी है. प्रसिद्ध लेखक असगर वजाहत ने इस बारे में बड़ा वाजिब सवाल उठाया है. वह कहते हैं कि आखिर इतनी बड़ी संख्या में मुसलमान अनपढ़ क्यों हैं. उनके अनुसार उत्तर भारत का मुस्लिम समाज विभिन्न धार्मिक मसलकों और मतों में इतना अधिक विभाजित कर दिया गया है कि उनके बीच संवाद की स्थिति ही नहीं बनती. हर मसलक और मत को मानने वाले केवल अपने धर्म गुरुओं की बात सुनते हैं. गुजरात में सबसे अधिक फिरकों और मसलकों में बंटे मुसलमान हैं. वजाहत कहते हैं कि अपवाद हो सकते हैं पर मुस्लिम धर्मगुरु शिक्षा पर बहुत अधिक बल नहीं देते क्योंकि शिक्षा प्राप्त व्यक्ति धर्मांधता से बाहर निकल आता है और मौलवी यह नहीं चाहते हैं कि उनकी पकड़ से उनके अनुयायी बाहर आए क्योंकि उनके मानने वालों की जितनी अधिक संख्या होती है वे चुनाव की राजनीति में उतना अधिक मोलतोल करते हैं.एक बड़ा सवाल यह भी है कि शिक्षित मुस्लिम मध्यमवर्ग मुसलमानों की शिक्षा का कोई बड़ा कार्यक्रम क्यों नहीं चलाता है. असगर वजाहत कहते हैं कि आजादी के बाद जन्मी यह पहली मुस्लिम पीढ़ी है जो मध्यम वर्ग बनी है. नए मध्यम वर्ग बनने के कारण उसके अंदर एक प्रकार का आत्मसंतोष और स्वार्थ पैदा हो गयाहै. वह दूसरों की चिंता किए बगैर आत्मकेंद्रित हो गई है. दूसरी तरफ मुस्लिम व्यापारी वर्ग प्रायः धन कमाने और धन के प्रदर्शन पर विश्वास करता है. ऐसी स्थिति में मुस्लिम समाज में शिक्षा के प्रति जागरूकता फैलाने का काम बहुत कठिन हो गया है.लेकिन यह भी सही है कि कुछ समय बाद यही वर्ग समाज को दिशा देने का काम करेगा. हालांकि कि कुछ लोग और संस्थाएं इस दिशा में काम कर रही हैं, पर उनका काम काफी नहीं है. यह स्थिति उत्तर भारत के मुसलमानों की है इसमें दक्षिणभारत के मुसलमानों को शामिल नहीं किया जा सकता है यह बात सभी को पता है कि ऐतिहासिक कारणों से उत्तर और दक्षिण भारत के मुसलमानोमें बहुत सामाजिक अंतर है, धार्मिक भी और सामाजिक भी.समाजशास्त्री प्रोफेसर राजेश मिश्र इस बात को दूसरे ढंग से कहते हैं कि उनके बीच चलाए जा रहे अधिकांश कार्यक्रम मजहबी चोले से बाहर नहीं आ पा रहे हैं. हो भी रहा है तो मदरसों का आधुनिकीकरण. आधुनिक शिक्षा के लिएमुस्लिम इलाकों में जो काम होना चाहिए वह नहीं हो पा रहा है और यह काम मुसलमानों के सहयोग के बिना मुमकिन भी नहीं है.लखनऊ के प्रसिद्ध समाजसेवी तारिक सिद्दीकी कहते हैं कि मुसलमानों की तालीम का काम बड़े पैमाने पर मुस्लिम संस्थाएं शुरु करती हैं लेकिन कुछ समय बाद वह संस्थाएं धार्मिक कामों में ज्यादा दिलचस्पी दिखाने लगती हैं.जाहिर है कि उन पर सामाजिक दबाव काम करता है. हालांकि वह यह भी कहते हैं कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, जौहर यूनिवर्सिटी और इसी तरह की दूसरी मुस्लिम शैक्षिक संस्थाओं में जाकर इस बात का अहसास होता है कि मुसलमानों में शैक्षिक रुझान बहुत तेजी से बढ़ रहा है. हां, यह काम अभी पिछले दस पंद्रह वर्षों में ही शुरू हुआ है तो इसके नतीजे भी दस पंद्रह साल के बाद दिखने लगेंगे.ब्लॉगः एस. वहीद

मुसलमानों के हक़ में सामने आईं ममता; मुहर्रम के लिए दुर्गा पूजा के वक्त में किया बदलाव

कोलकाता:इस साल हिंदुओं के त्यौहार दुर्गा पूजा जोकि कोलकाता में बहुत ही धूम-धाम से मनाया जाता है और मुसलमानों का त्यौहार मुहर्रम एक साथ ही आ रहे हैं। जिसके चलते शहरमें कोई सांप्रदायिक तनाव पैदा न हो इसलिए बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मुहर्रम के मौके पर मुसलमानों के तुष्टीकरण के लिए दुर्गा विसर्जन के वक़्त में कुछ बदलाव किया है और हिंदुओं को मूर्ति विसर्जनदशहरे के दिन दोपहर 4 बजे के अंदर करने के लिए कहा है।Facebook पर हमारे पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करेंइस मुद्दे पर विपक्षी दलों ने ममता के फैसले पर विरोध जताते हुए कहा है कि ऐसा ‘फतवा’ निकालकर ममता ने हिंदुओं की धार्मिक परंपराओं को पैरों तले कुचलने का काम किया है और दूसरी तरफ विरोध और हिन्दुओं के क्रोध से बचने के लिए राज्य के दुर्गा उत्सव मंडलों को दान देने का लालच दिखाया है। मुसलमानों की बैठक बुलाकर उनको मुहर्रम के वक़्त को बदलने का अनुरोध क्यों नहीं किया। गौरतलब है कि ममता बनर्जी ने पिछले साल भी इसी तरह का आदेश दिया था।

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का पक्ष झूठा और महिला विरोधी है- भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन

नई दिल्ली। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की ओर से तीन तलाक एवं बहुविवाह के संदर्भ में उच्चतम न्यायालय में दिए गए हलफनामे को लेकर देश की कुछ प्रमुख मुस्लिम महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने इस प्रमुख मुस्लिम निकाय पर निशाना साधते हुए आज कहा कि इसका रूख गुमराह करने वाला, इस्लाम विरोधी और महिला विरोधी है। उन्होंने एक साथतीन तलाक और बहुविवाह पर रोक लगाने की मांग की और कहा कि अदालती दखल से महिलाओं को उनके वो अधिकार मिलने चाहिए जो शरीयत एवं कुरान में उनको दिए गए हैं।Facebook पर हमारे पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करेंभारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की संस्थापक नूरजहां सफिया नियाज ने भाषा से कहा, पर्सनल लॉ बोर्ड ने अदालत के समक्ष जो बातें कीं वो संविधान विरोधी, इस्लाम विरोधी और महिला विरोधी हैं। यह बहुत दुखद स्थिति है। हमारी मांग है कि देश की सबसे अदालत दखल दे और मुस्लिम महिलाओं को उनका हक दिलाए। इस्लामिक नारीवादी शीबा असलम फहमी का कहना है कि बोर्ड ने देश की सबसे बड़ी अदालत में जो पक्ष रखा है तो झूठा और महिला विरोधी है। उन्होंने कहा, पर्सनल लॉ बोर्ड ने जो हलफनामा दिया है उसमें अजीबो-गरीब तर्क दिए हैं। उसका पक्ष झूठा और महिलाओं के खिलाफ है। उसने महिलाओं को कमजोर के तौर पर पेश करने की कोशिश की है। महिलाएं सिर्फ अपना वो हक मांग रही हैं जो उनको शरीयत और कुरान ने दिए हैं।

Friday, 2 September 2016

मिस्र के लोग आधुनिक इस्लाम की आवाज ह

नई दिल्ली। मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल सीसी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को साझा वकतव्य जारी किया। मोदी नेकहा कि राष्ट्रपति अल सीसी और मैं भारत और मिस्र के बीच संबंधों को मजबूत करने पर सहमत हुए हैं। उन्होंने कहा कि ‘हम मिस्र के साथ कृषि, स्किल डेवलपमेंट और हेल्थ सेक्टर में सहयोग को और गहरा करेंगे। मिस्र एशिया-अफ्रीका के बीच प्राकृतिक ब्रिज है। भारत औरमिस्र के बीच सामग्री और सेवा को बढ़ाने पर बनी सहमति हुई है। हम इस बात पर सहमत हुए हैं कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की जरूरत है, ताकि आज की सच्चाई से रूबरू हो सकें।’पीएम मोदी ने कहा कि आपके (मिस्र) लोग आधुनिकइस्लाम की आवाज है और आपका देश क्षेत्रीय शांति और स्थिरता का कारक है। बढ़ती कट्टरताऔर आतंकवाद केवल हम दोनों देशों के लिए ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए खतरा हैं।

सऊदी अरब आतंकियों का ठिकाना,उनके अंदर है वहाबियों वाली विचार धारा:ईरान

ईरान : ईरान ने कहा है कि दुनिया यह जान गयी है कि सऊदी अरब और वहाबी विचारधारा ही मध्यपूर्व और दूसरे क्षेत्र में चरमपंथी हिंसा का स्रोत है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता बहराम क़ासेमी ने गुरुवार को कहा कि सऊदी अरब की आतंकवाद में अपनी संलिप्तता को छिपाने की कोशिश नाकाम हो गयी है। उन्होंने कहा, “दुनिया की सबसे भयंकर आतंकवादी कार्यवाही और यमन में पेट्रो डॉलर के ज़रिए बाल जनसंहार में संलिप्तता जैसी सच्चाई को छिपाने की सऊदी अरब की निरंतर कोशिश के बावजूद, आज दुनिया अच्छी तरह जान गयी है कि इस आतंक का स्रोत सऊदी अरब और उसकी जाली विचार धारा वहाबियत है।”बहराम क़ासेमी का “दुनिया की सबसे भयंकर आतंकवादी कार्यवाही” से अभिप्राय 11 सितंबर 2001 की अमरीका में घटी घटना है जिसे 19 लोगों ने अंजाम दिया था कि जिनमें से 15 सऊदी अरब के नागरिक थे और इन लोगों के बारे में कहा जाता है कि वे सऊदी शासन के संपर्क में थे। 11 सितंबर की घटना में 3000लोग मारे गए थे। ज्ञात रहे सऊदी अरब वहाबी विचारधारा का खुल्लम खुल्ला प्रचार किया जाता है।

सामाजिक सुधार के नाम पर मजहब सेछेड़खानी बर्दाश्त नही:मुस्लिम पर्सनल लौ बोर्ड

दिल्ली:आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में चल रहे ट्रिपल तलाक़ के कानून को बंद करने के मामले में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि पर्सनल लॉ को इस तैह से चैलेंज नहीं किया जा सकता कटुबकी ऐसा करना अभिव्यक्ति की आज़ादी खत्म करने के जैसा होगा।बोर्ड ने यह भी कहा कि सामाजिक सुधार के नाम पर वो धर्म और धर्म ग्रंथों में लिखे गए नियमों को बदलने की सोच का समर्थन हरगिज़ नहीं करेंगे।

महिला सुरक्षा है ताक पर और कुछ राजनितिक हाथ पड़े है तलाक के पीछे।

देश की दस कड़ोड़ महिलायें इस्लामिक रस्मो की हिफाज़त के लियें लड़ेंगी .उन्होंने कहा भारतीय समाज में महिला उत्पीडन बड़ी समस्या है जिसमे कि दहेज़,डोमेस्टिक वायलेंस और महिलाओं की सुरक्षा जैसे कई मुद्दे है जोकि भारतीय महिलाओ में खौफ पैदा करती है लेकिन इन मामलो नज़रंदाज़ करके तलाक के मसले पर मीडिया में डिबेट कराई जा रही है या यु कहें किसी के इशारे पर करवाई जा रही हैउन्होंने मीडिया द्वारा प्रोपगंडा करने पर भी मीडिया की भी आलोचना की .अस्मा जहरा हैदराबाद से भोपाल एक जलसे को संबोदित करने आई थी।
आल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड ने सरकार द्वारा मुस्लिम के मज़हबी मामलो में दखल देनेपर सख्त एतराज़ किया है .डाक्टर अस्मा जेहरा जोकि आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड की एग्जीक्यूटिव कमिटी मेम्बर है ने मीडिया से बातचीत में कहा “भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है मुसलमानों को संविधान ये हक देता है हम अपने मज़हबी अरकान अपने हिसाब से तय करे .मुस्लिम ही नही यहाँ हर धर्म को अपने हिसाब से अपने धार्मिक क्रिया कर्म करने की इज़ाज़त है मुस्लिम पर्सनेल ला बोर्ड पाक कुरान और पैगमबर मुहम्मद की सुन्नत पे चलता हैहम अपने मज़हबी मामलो में किसी भी प्रकार की दखल अंदाजी के खिलाफ है

हिन्दुस्तान में ईद उल अज़हा की तारिख हुई मुक़र्रर,13 को मनाई जायेगी बकरा ईद।

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में ईद उल अजहा 13सितम्बर को मनाई जायेगी.रीयत ऐ हिलाल कमिटी हैदराबाद डेक्कन ने इस बात का एलान किया .एलान करते वक़्त कमिटी ने कहा चुकी आज चाँद नही दिखायी दिया इस लियें ईद 13 सितम्बर को मनाई जाएगी .मजलिस ऐ उलेमा डेक्कन के सेक्रेटरी जनरल और मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के मेम्बर सयेद कुबूल पाशा शुत्तरी भी मौजूद थे .देश के बाकी हिस्सों में भी ईद अल अजहा 13 सितम्बर को ही मनाये जाने का एलान होने के समाचार प्राप्त हो रहे ह

बियर बोतल सामने देख मुस्लिम खिलाडी ने प्रेस कांफ्रेंस में मीडिया से नही की बात

कुछ ऐसे शक्श भी है इस दुनिया में जिनको पैसा आने के बाद भी अल्लाह का डर और भरम होता है,वही देखने को मिला है यहाँ,वेलेंशिया -जर्मनी में जन्मे आर्सेनल फुटबॉलर श्कोद्रन मुस्ताफी ने मीडिया से बात करने से इसलियें इनकार कर दिया क्युकी जहाँ प्रेस कांफ्रेंस हो रही थी वहां बियर बोतल रखी हुयी थीआपको बता दे मुस्ताफी आर्सेनल क्लब के स्टारखिलाड़ी है और साथ ही इस्लाम पे अकीदत रखने वाले मज़हब के हर अरकान पे चलने वाले इंसान भीहै उनके माता पिता अल्बानिया से है .प्रेस कांफ्रेंस में शराब की बोतल से वो इस कधर नाराज़ थे कि उन्होंने वेलेंशिया चीफ को भी गुस्से में बात की और कहा ये सब मेरे नजरो से हटाओ

Thursday, 1 September 2016

मुसलमान है सबसे बेवकूफ कौम,आज के हालात इसी पागलपन का नतीजा है।

इस पोस्ट को करने का लेखक का साफ़ नाज़िरिया है,के वो मुस्लिम धर्म से फिरकापरस्तों को जड़ से मिटाने की इक कोशिश कर रहा है अगर आपको इस लेखक की बात समझ आती है तो कृपया करके इसपर अमल करे और अमन शांति को बढ़ावा दे।
हिंदुओं में सिर्फ़ 73 नहीं बल्कि हज़ारों फ़िरके मौजूद हैं मगर धर्म के आधार पर वो कभी नहीं लड़ते । सिखों में अकाली व निरंकारी कभीएक दूसरे के मतभेद के बावजूद नहीं लड़ते । दिगम्बर जैन और श्वेतामबर जैन दोनों समुदायों में बहुत ज़बरदस्त मतभेद है कि दिगम्बर मुनि नंगे रहते हैं और श्वेताम्बर सिर से पैर तक श्वेत वस्त्र धारण करते हैं, मगर क्या मजाल है कि अपने प्रवचनों के दौरानएक दूसरे की आलोचना करें या गालियों से नवाज़ें ।ईसाइयों में रोमन कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट फ़िरकों के बीच प्रारम्भ में कड़वाहट रही मगर जल्द ही दोनों को अक्ल आ गयी और उन्होंने लड़ना बंद कर दिया ।पूरी दुनियाँ  में सिर्फ़ मुसलमान ही ऐसी बेवकूफ कौम है जिसने अपने दीन की छोटी छोटी बातों पर बड़े बड़े विवाद खड़े किये और बेशुमारफ़िरके बना डाले। हर फ़िरका अपने आप में एक दीन बन गया और उसने सिर्फ़ खुद को मुसलमान और दूसरे फ़िरकों को काफ़िर समझना शुरू कर दिया।फेसबुक पर हमारा पेज लाइक करने की लिये, यहाँ क्लिक करे…जिस कौम का दीन एक रब  एक रसूल एक कुरआन एक  किबला एक हो फिर  भी हज़ारों तरह के मज़हबी झगड़े ? आखिर अल्लाह इन पागलों पर अपनी रहमतें क्यों नाज़िल फ़रमाये और क्यों न मुसीबत में डाले आज जो हालात पूरी दुनियाँ में मुसलमानों के हैं वो इसी पागलपन का नतीजा है ।अभी भी वक्त है कि मुसलमान सुधर जायें इस्लाम को मज़बूती से थाम लें और एक ठोस उम्मत बन जायें एंव पिछली बेवकूफ़ियाँ न दोहरायें।फेसबुक पर हमारा पेज लाइक करने की लिये, यहाँ क्लिक करे…


(ये लेखक के निजी विचार हैं ) DELHI UP LIVE की सहमति इसमें कोई मायने नहीं रखती।
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क्या 4 शादियां कर 40 बच्चे पैदा कर रहे हैं मुसलमान: मिथ और सच्चाई!

मुसलमानों की आबादी बाक़ी देश के मुक़ाबले तेज़ी से क्यों बढ़ रही है? क्या मुसलमान जानबूझ कर तेज़ी से अपनी आबादी बढ़ाने में जुटे हैं? क्या मुसलमान चार-चार शादियाँ कर अनगिनत बच्चे पैदा कर रहे हैं? क्या मुसलमान परिवार नियोजन को इसलाम-विरोधी मानते हैं? क्या हैं मिथ और क्या है सच्चाई? एक विश्लेषण.तो साल भर से रुकी हुई वह रिपोर्ट अब जारी होनेवाली है! हालाँकि रिपोर्ट 'लीक' हो कर तब ही कई जगह छप-छपा चुकी थी. अब एक साल बाद फिर 'लीक' हो कर छपी है. ख़बर है कि यह सरकारी तौर पर जल्दी ही जारी होनेवाली है! रिपोर्ट 2011 की जनगणना की है. देश की आबादी में मुसलमानों का हिस्सा बढ़ गया है. 2001 में कुल आबादी में मुसलमान 13.4 प्रतिशत थे,जो 2011 में बढ़ कर 14.2 प्रतिशत हो गये! असम, पश्चिम बंगाल, जम्मू-कश्मीर, केरल, उत्तराखंड, हरियाणा और यहाँ तक कि दिल्ली की आबादी में भी मुसलमानों का हिस्सा पिछले दस सालों में काफ़ी बढ़ा है! असम में 2001 में क़रीब 31 प्रतिशत मुसलमान थे, जो 2011 में बढ़ कर 34 प्रतिशत के पारहो गये. पश्चिम बंगाल में 25.2 प्रतिशत से बढ़ कर 27, केरल में 24.7 प्रतिशत से बढ़ कर 26.6, उत्तराखंड में 11.9 प्रतिशत से बढ़ कर 13.9, जम्मू-कश्मीर में 67 प्रतिशत से बढ़ कर 68.3, हरियाणा में 5.8 प्रतिशत से बढ़ कर 7 और दिल्ली की आबादी में मुसलमानों का हिस्सा 11.7 प्रतिशत से बढ़ कर 12.9 प्रतिशत हो गया. क्या हुआ बांग्लादेशियों का?वैसे बाक़ी देश के मुक़ाबले असम और पश्चिम बंगाल में मुसलिम आबादी में हुई भारी वृद्धि के पीछे बांग्लादेश से होनेवाली घुसपैठ भी एक बड़ा कारण है. दिलचस्प बात यह है कि नौ महीने पहले अपने चुनावप्रचार के दौरान नरेन्द्र मोदी ने पश्चिम बंगाल में एक सभा में दहाड़ कर कहा था कि बांग्लादेशी घुसपैठिये 16 मई के बाद अपना बोरिया-बिस्तर बाँध कर तैयार रहें, वह यहाँ रहने नहीं पायेंगे. लेकिन सत्ता में आने के बाद से अभी तक सरकार ने इस पर चूँ भी नहीं की है! तब हिन्दू वोट बटोरने थे, अब सरकार चलानी है. दोनों में बड़ा फ़र्क़ है! ज़ाहिर है कि अब भी ये आँकड़े साक्षी महाराज जैसों को नया बारूदभी देंगे. वैसे हर जनगणना के बाद यह सवाल उठता रहा है कि मुसलमानों की आबादी बाक़ी देश के मुक़ाबले ज़्यादा तेज़ क्यों बढ़ रही है? और क्या एक दिन मुसलमानों की आबादी इतनी बढ़ जायेगी कि वह हिन्दुओं से संख्या में आगे निकल जायेंगे? ये सवाल आज से नहीं उठ रहे हैं. आज से सौ साल से भी ज़्यादा पहले 1901 में जब अविभाजित भारत में आबादी के आँकड़े आये और पता चला कि 1881 में 75.1 प्रतिशत हिन्दुओं के मुक़ाबले 1901 में उनका हिस्सा घट कर 72.9 प्रतिशत रह गया है, तब बड़ा बखेड़ा खड़ा हुआ. उसके बाद से लगातार यह बात उठती रही है कि मुसलमान तेज़ी से अपनी आबादी बढ़ाने मेंजुटे हैं, वह चार शादियाँ करते हैं, अनगिनत बच्चे पैदा करते हैं, परिवार नियोजन को ग़ैर-इसलामी मानते हैं और अगर उन पर अंकुश नहीं लगाया गया तो एकदिन भारत मुसलिम राष्ट्र हो जायेगा!क्या अल्पसंख्यक हो जायेंगे हिन्दू?अभी पिछले दिनों उज्जैन जाना हुआ. दिल्ली के अपने एक पत्रकार मित्र के साथ था. वहाँ सड़क पर पुलिस केएक थानेदार महोदय मिले. उन्हें बताया गया कि दिल्ली के बड़े पत्रकार आये हैं. तो कहने लगे, साहबबुरा हाल है. यहाँ एक-एक मुसलमान चालीस-चालीस बच्चे पैदा कर रहा है. आप मीडियावाले कुछ लिखते नहीं है! सवाल यह है कि एक थानेदार को अपने इलाक़े की आबादी के बारे में अच्छी तरह पता होता है. कैसे लोग हैं, कैसे रहते हैं, क्या करते हैं, कितने अपराधी हैं, इलाक़े की आर्थिक हालत कैसी है, वग़ैरह-वग़ैरह. फिर भी पुलिस का वह अफ़सर पूरी ईमानदारी से यह धारणा क्यों पाले बैठा था कि एक-एक मुसलमान चार-चार शादियाँ और चालीस-चालीस बच्चे पैदा कर रहा है! यह अकेले उस पुलिस अफ़सर की बात नहीं. बहुत-से लोग ऐसा ही मानते हैं. पढ़े-लिखे हों या अनपढ़. साक्षी महाराज हों या बद्रिकाश्रम के शंकराचार्य, जो हिन्दू महिलाओं को चार से लेकर दस बच्चे पैदा करने की सलाह दे रहे हैं! क्यों? तर्क यही है न कि अगर हिन्दुओं ने अपनी आबादी तेज़ी से नबढ़ायी तो एक दिन वह 'अपने ही देश में अल्पसंख्यक' हो जायेंगे!मुसलमान: मिथ और सच्चाई!यह सही है कि मुसलमानों की आबादी हिन्दुओं या और दूसरे धर्मावलम्बियों के मुक़ाबले ज़्यादा तेज़ीसे बढ़ी है. 1961 में देश में केवल 10.7 प्रतिशत मुसलमान और 83.4 प्रतिशत हिन्दू थे, जबकि 2011 में मुसलमान बढ़ कर 14.2 प्रतिशत हो गये और हिन्दुओं के घट कर 80 प्रतिशत से कम रह जाने का अनुमान है. लेकिन फिर भी न हालत उतनी 'विस्फोटक' है, जैसी उसे बनाने की कोशिश की जा रही और न ही उन तमाम 'मिथों' में कोई सार है, जिन्हें मुसलमानों के बारे में फैलाया जाता है. सच यह है कि पिछले दस-पन्द्रह सालों में मुसलमानों की आबादी की बढ़ोत्तरी दर लगातार गिरी है. 1991 से 2001 के दस सालों के बीचमुसलमानों की आबादी 29 प्रतिशत बढ़ी थी, लेकिन 2001 से 2011 के दस सालों में यह बढ़त सिर्फ़ 24प्रतिशत ही रही. हालाँकि कुल आबादी की औसत बढ़ोत्तरी इन दस सालों में 18 प्रतिशत ही रही. उसके मुक़ाबले मुसलमानों की बढ़ोत्तरी दर 6 प्रतिशत अंक ज़्यादा है, लेकिन फिर भी उसके पहले केदस सालों के मुक़ाबले यह काफ़ी कम है. एक रिसर्च रिपोर्ट (हिन्दू-मुसलिम फ़र्टिलिटी डिफ़्रेन्शियल्स: आर. बी. भगत और पुरुजित प्रहराज) के मुताबिक़ 1998-99 में दूसरे राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के समय जनन दर (एक महिला अपने जीवनकाल में जितने बच्चे पैदा करती है)हिन्दुओं में 2.8 और मुसलमानों में 3.6 बच्चा प्रति महिला थी. 2005-06 में हुए तीसरे राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (Vol 1, Page 80, Table 4.2) के अनुसार यह घट कर हिन्दुओंमें 2.59 और मुसलमानों में 3.4 रह गयी थी. यानी औसतन एक मुसलिम महिला एक हिन्दू महिला के मुक़ाबले अधिक से अधिक एक बच्चे को और जन्म देती है. तो ज़ाहिर-सी बात है कि यह मिथ पूरी तरह निराधार है कि मुसलिम परिवारों में दस-दस बच्चे पैदा होते हैं. इसी तरह, लिंग अनुपात को देखिए. 1000 मुसलमान पुरुषों के मुक़ाबले महिलाओं की संख्या 936 है. यानी हज़ार में कम से कम 64 मुसलमान पुरुषों को अविवाहित ही रह जाना पड़ता है.ऐसे में मुसलमान चार-चार शादियाँ कैसे कर सकते हैं?मुसलमान और परिवार नियोजनएक मिथ यह है कि मुसलमान परिवार नियोजन को नहीं अपनाते. यह मिथ भी पूरी तरह ग़लत है. केवल भारत में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में मुसलिम आबादी बड़ी संख्या में परिवार नियोजन को अपना रही है. ईरान और बांग्लादेश ने तो इस मामले में कमाल ही कर दिया है.1979 की धार्मिक क्रान्ति के बाद ईरान ने परिवार नियोजन को पूरी तरह ख़ारिज कर दिया था, लेकिन दस साल में ही जब जनन दर आठ बच्चों तक पहुँच गयी, तो ईरान के इसलामिक शासकों को परिवार नियोजन की ओर लौटना पड़ा और आज वहाँ जनन दर घट कर सिर्फ़ दो बच्चा प्रति महिला रह गयी है यानी भारत की हिन्दू महिला की जनन दर से भी कम! इसी प्रकार बांग्लादेश में भी जनन दर घट कर अब तीन बच्चों पर आ गयी है. प्रसिद्ध जनसांख्यिकी विद् निकोलस एबरस्टाट और अपूर्वा शाह के एक अध्य्यन (फ़र्टिलिटी डिक्लाइन इन मुसलिम वर्ल्ड) के मुताबिक़ 49 मुसलिम बहुल देशों में जनन दर 41 प्रतिशत कम हुई है, जबकि पूरी दुनिया में यह 33 प्रतिशत ही घटी है. इनमें ईरान, बांग्लादेश के अलावा ओमान, संयुक्त अरब अमीरात, अल्जीरिया, ट्यूनीशिया, लीबिया, अल्बानिया, क़तर और क़ुवैत में पिछले तीन दशकों में जनन दर 60 प्रतिशत से ज़्यादा गिरी है और वहाँ परिवार नियोजन को अपनाने से किसी को इनकार नहीं है. भारत में मुसलमान क्यों ज़्यादा बच्चे पैदा करते हैं? ग़रीबी और अशिक्षा इसका सबसे बड़ा कारण है.भगत और प्रहराज के अध्य्यन के मुताबिक़ 1992-93 के एक अध्य्यन के अनुसार तब हाईस्कूल या उससे ऊपर शिक्षित मुसलिम परिवारों में जनन दर सिर्फ़ तीन बच्चा प्रति महिला रही, जबकि अनपढ़ परिवारों में यह पाँच बच्चा प्रति महिला रही. यही बात हिन्दू परिवारों पर भी लागू रही. हाईस्कूल व उससे ऊपर शिक्षित हिन्दू परिवार में जनन दर दो बच्चा प्रति महिला रही, जबकि अनपढ़ हिन्दू परिवार में यह चार बच्चा प्रति महिला रही [स्रोत IIPS (1995): 99]. ठीक यही बात आर्थिक पिछड़ेपन के मामले में भी देखने में आयी और अनुसूचित जातियों व अनुसूचित जनजातियों में जनन दर औसत से कहीं ज़्यादा पायी गयी. 2005-06 के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (Vol 1, Page 80, Table 4.2) में भी यही सामने आया कि समाज के बिलकुल अशिक्षित वर्ग में राष्ट्रीय जनन दर 3.55 और सबसे ग़रीब वर्ग में3.89 रही, जो राष्ट्रीय औसत से कहीं ज़्यादा है. औरइसके उलट सबसे अधिक पढ़े-लिखे वर्ग में राष्ट्रीय जनन दर केवल 1.8 और सबसे धनी वर्ग में केवल 1.78 रही. यानी स्पष्ट है कि समाज के जिस वर्ग में जितनीज़्यादा ग़रीबी और अशिक्षा है, उनमें परिवार नियोजन के बारे में चेतना का उतना ही अभाव भी है. इसलिए जनन दर को नियंत्रण में लाने के लिए शिक्षा और आर्थिक विकास पर सबसे पहले ध्यान देना होगा.गर्भ निरोध से परहेज़ नहींपरिवार नियोजन की बात करें तो देश में 50.2 प्रतिशत हिन्दू महिलाएँ गर्भ निरोध का कोई आधुनिकतरीक़ा अपनाती हैं, जबकि उनके मुक़ाबले 36.4 प्रतिशत मुसलिम महिलाएँ ऐसे तरीक़े अपनाती हैं (राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-3, 2005-06, Vol 1, Page 122, Table 5.6.1). इससे दो बातें साफ़ होती हैं. एक यह कि मुसलिम महिलाएँ गर्भ निरोध के तरीक़े अपना रही हैं, हालाँकि हिन्दू महिलाओं के मुक़ाबले उनकी संख्या कम है और दूसरी यह कि ग़रीब और अशिक्षित मुसलिम महिलाओं में यह आँकड़ा और भी घट जाता है. ऐसे में साफ़ है किमुसलिम महिलाओं को गर्भ निरोध और परिवार नियोजन से कोई परहेज़ नहीं. ज़रूरत यह है कि उन्हें इस बारे में सचेत, शिक्षित और प्रोत्साहित किया जाये.दूसरी एक और बात, जिसकी ओर कम ही ध्यान जाता है. हिन्दुओं के मुक़ाबले मुसलमान की जीवन प्रत्याशा (Life expectancy at birth) लगभग तीन साल अधिक है. यानी हिन्दुओं के लिए जीने की उम्मीद 2005-06 में 65 साल थी, जबकि मुसलमानों के लिए 68 साल. सामान्य भाषा में समझें तो एक मुसलमान एक हिन्दू के मुक़ाबले कुछ अधिक समय तक जीवित रहता है ( Inequality in Human Development by Social and Economic Groups in India). इसके अलावा हिन्दुओं में बाल मृत्यु दर 76 है, जबकि मुसलमानोंमें यह केवल 70 है (राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-3, 2005-06, Vol 1, Page 182, Table 7.2). यह दोनों बातें भी मुसलमानों की आबादी बढ़ने का एक कारण है. आबादी का बढ़ना चिन्ता की बात है. इसपर लगाम लगनी चाहिए. लेकिन इसका हल वह नहीं, जो साक्षी महाराज जैसे लोग सुझाते हैं. हल यह है कि सरकार विकास की रोशनी को पिछड़े गलियारों तक जल्दी से जल्दी ले जाये, शिक्षा की सुविधा को बढ़ाये, परिवार नियोजन कार्यक्रमों के लिए ज़ोरदार मुहिम छेड़े, घर-घर पहुँचे, लोगों को समझे और समझाये तो तसवीर क्यों नहीं बदलेगी? आख़िर पोलियो के ख़िलाफ़ अभियान सफल हुआ या नहीं!(ये लेखक के निजी विचार हैं। लेखक वरिष्ठ पत्रकार व लेखक हैं। यह लेख उनके ब्लॉग "राग देश" से साभार लिया गया है।)

43% मुस्लिम निरक्षर , मुस्लिम सबसे अशिक्षित समुदाय,आज के हालात इसी का नतीजा।

नई दिल्ली -भारत में तालीम में मुस्लिम कितने पीछे है इसको 2011 सेन्सस के आकड़ो से जाना जा सकता है मुस्लिम समुदाय के 43 परसेंट हिस्सा निरक्षर हैजोकि धार्मिक आधार पे संकेत दे रहा है कि मुस्लिम शिक्षा में सबसे पिछड़ा है वही जैन समुदाय में सिर्फ 13 फीसद निरक्षर है इस तरहजैन समुदाय भारत का सबसे शिक्षित समुदाय हैवही हिन्दू में 36 परसेंट निरक्षर है और सिखमें 32 फीसद निरक्षर है बौध मे ये दर 28 फ़साद और ईसाईयों में 25 फीसद हैमुसलमानों में स्नातक सिर्फ 2.7 फीसद है वहीसिर्फ .44 टेकनिकल डिग्री या डिप्लोमा होल्डर ह

कल तक अल्लाह के विरोध में नारे लगाने वाला,आज इस्लामे मोहब्बत में डूबा।

कहते हैं उस अल्लाह की एक नज़र ही काफी होती है ज़िन्दगी बदलने के लिए। उस अल्लाह के करम को समझने और जानने के लिए जाने कितनो ने कोशिश की लेकिन उस अल्लाह परवदिगार का भेद कोई नहीं पा सका है।कुछ ऐसा ही हुआ जर्मन के रहने वाले वेर्नेर कलावुन के साथ जोकि पिछले इस्लाम के दर पर पहुँचने से पहले कट्टड़ नाज़ी थे और इस्लाम का जमकर विरोध करते थे। लेकिन अल्लाह का नूर वेर्नेर पर कुछ यूँ बरसा कि जो हाथ इस्लाम के, अल्लाह के खिलाफ नारेबाजी में उठते थे वही हाथ आज अल्लाह की इबादत में उठने लगे।और यह मुमकिन हो पाया सिर्फ कुरान शरीफ की वजह से। जिसके बारे में वेर्नेर बताते हैं कि जब उन्होंने जर्मनी के महान कवि जोहांन वोल्फगांग की लिखी हुई ईस्टर्न दिवान और कवितायें पढ़ीं जिसमें जोहांन ने पैगम्बर मुहम्मद की तारीफ में बहुत कुछ लिखा हुआ था जिसके बाद उसने इस्लाम के बारे में पढ़ना शुरू किया। कुरान पढ़ी और उसे समझ आया कि दुनिया और ज़िन्दगी के जो रहस्य जो पहेलियाँ कुरान में सुलझा कर बताई गयी हैं वैसा किसी और धर्मग्रन्थ में नहीं बताया गया।इसी से प्रभावित होकर वेर्नेर ने इस्लाम को जानने के लिए कोशिश जारी रखी और इस्लाम की रहअपना ली। इस्लाम अपनाने के बाद वेर्नेर ने अपना नाम बदल कर इब्राहिम रख लिया और सीरिया,इराक और अफगानिस्तान से आये शरणार्थियों की सेवा में काम करना शुरू कर दिया।

ऑस्ट्रेलिया ने दिया मुस्लिम महिलाओ को तोहफा,हिजाब को दिया बैंक ने आधिकारिक पोशाक का दर्जा।

देश विदेश में हो रहे हिजाब के खिलाफ बार बार बयान बाज़ी और उसपर अनेक टिप्पणियाँ,यही वजह रही के जिहाब इक फैशन के तोर पर आज कल सबके ज़हनों पर छा गया है,लोगो का हिजाब की तरफ बढ़ता हुआ क्रेज़ देखकर यही अनुमान लगाया जा रहा है,जिसको गलत बताकर सब इसकी निंदा कर रहे थे आज वही इक फैशन के रूप में सबकी ज़िन्दगी में धीरे धीरे घर बनाता जा रहा है,हाल ही में आई हिजाब पर ऑस्ट्रेलिया से इक खबर के अनुसार,
कैनबरा। दुनियाभर में मुसलिम महिलाओं के पहनावे को लेकर कई तरह की पहल की जा रही हैं। अब ऑस्ट्रेलिया के ‘वेस्टपैक’ बैंक ने अपने कर्मचारियों की नई आधिकारिक पोशाक के तौर परनिगमित हिजाब को भी शामिल करने का फैसला किया है। ‘न्यूजकॉर्प’ की खबर के मुताबिक ये पोशाक मशहूर आस्ट्रेलिआई डिजाइनर कार्ला जम्पाटी डिजाइन करेंगी। इसे अप्रैल 2017 तक लान्च किए जाने की उम्मीद है।कॉमनवेल्थ बैंक और ऑप्टस जैसी कुछ संस्थान कर्मचारियों की आधिकारिक पोशाक के साथ हिजाब को शामिल कर चुकीं हैं। इसको ध्यान में रखकर ही ऑस्ट्रेलियाई बैंक ने ये कदम उठाया है। बैंक की प्रवक्ता ने कहा कि हल्के नीले रंग के इस हिजाब को वेस्टपैक के ‘डबल्यू’ लोगो के साथ डिजाइन किया गया है। ये लोगो, कार्यस्थल पर विविधता और अखंडता को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि इसके जरिए हम लोगों को अपना समर्थन दिखा सकते हैं और कार्यस्थल पर अच्छा अनुभव करा सकते हैं।Facebook पर हमारे पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करेंसिडनी स्थित वेस्टपैक बैंक की शाखा में काम करने वाली कोनी वेहबे ने कहा कि मुझे कार्यस्थल पर हिजाब पहनना अच्छा लगता है, इससे दूसरों को मेरी संस्कृति और मेरे बारे में जानने में मदद मिलती है। उन्होंने कहा कि हिजाब दिखाता है कि वेस्टपैक सारी संस्कृतियों को पहचानता और स्वीकार करता है।

Wednesday, 31 August 2016

मुस्लिम नोजवानो के पासपोर्ट रद्द करने की हो रही तैयारी।

नई दिल्ली : ISIS के मंसूबों को खत्म करने के लिए भारत सरकार और खुफिया एजेंसियों ने देश के करीब एक हजार से भी ज्यादा नौजवानों का पासपोर्ट रद्द करने की पूरी तैयारी कर ली है। उन सभी नौजवानों का पासपोर्ट रद्द करने की तैयारी है जिनके खिलाफ आईएसआई के साथ जुड़े होने के पक्के सबूत मिल चुके हैं कि वो संदिग्ध गतिविधियों में शामिल हैं और ISIS में शामिल होने के लिए वो देश छोड़कर जा भी सकते हैं।Facebook पर हमारे पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करेंISIS के प्रति भारत के युवाओं के बढ़ते आकर्षण से केंद्र सरकार बहुत ज्यादा चिंतित है और इन सबसे निबटने के लिए सुरक्षा एजेंसियों ने एहतियाती कदम भी उठाने शुरू करदिये हैं। सूत्रों के अनुसार केंद्र सरकार अगले कुछ ही दिनों में एक हजार से भी ज्यादा युवाओं के पासपोर्ट रद्द करेगी जिनके बारे में शक है कि वो ISIS के बहकावे में आकर उनकी टीम में शामिल होने जा सकते हैं। और इसके अलावा करीब एक हजार युवकों के पासपोर्ट को निगरानी में रख दिया गया है जिनके बारे में सरकार को ये अंदेशा है कि वो रैडिकल तत्वों के संपर्क में हैं। हिंदुस्तान को इस वक्त सबसे बड़ा खतरा है दुनिया के सबसे ज्यादा क्रूर आतंकवादी संगठन आईएसआईएस से। ISIS भारत में पैर पसारने की अपनी पूरी कोशिश कर रहा है। और इस बात के निशान भी मिल चुके हैं कि ISIS नौजवानों को किस कदर भड़का रहा है। लेकिन अब भारत सरकार और खुफिया एजेंसियों नेISIS को झटका देने की पूरी तैयारी कर ली है।
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