एक अमेरिकी महिला नौसैनिक ने ईसाई धर्म त्याग कर इस्लाम धर्म ग्रहण करने के पीछे कई कारण बताये । उन्हें लगा जैसे अल्लाह ने उनकी ज़िंदगी में किसी फ़रिश्ते को भेजकर उन तक ये सन्देश भेजा है कि इस्लाम ही उन्हें सुरक्षित और इज़्ज़त भरी ज़िंदगी दे सकता है ।इस्लाम धर्म ग्रहण करने के बाद वे बताती हैं कि ‘मेरा नाम जीनेशा बिंगम (इस्लाम अपनाने के बाद जीनेशा बिंगम) है। मैं मोरमन कैथोलिक ईसाई धर्म में पैदा हुई। मैं पच्चीस साल की हूं। मैं अमेरिकाके लास वेगास शहर में जन्मी,पली बढ़ी और कॉलेज की पढ़ाई की।’मेरा पारिवारिक माहौल बेहद गंदा था। मेरे पिता अक्सर मुझे झिाड़कते और पीटते थे। मेरी मां मुझे उनके उत्त्पीडऩ से बचाने में लगी रहती थी। पिता मेरी मां की भी पिटाई करते थे। मेरे दादा यौनाचारीथे। मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि वे मुझे अपनी हवस का शिकार बना सकते हैं। मेरे दादा ने मेरी मां, मेरी बहिन और मेरे साथ बलात्कार किया।जब भी मेरे पिता शराब पीए हुए होते तो हम समझ लेते थे कि घर में हम में से कोई ना कोई जख्मी जरूर होगा। मेरे पिता मुझे लज्जित करने के लिए मेरे रिश्तेदारों और मित्रों के सामने बुरी तरह पीटते थे। मैं अक्सर सोचती ईश्वर मेरे साथ आखिर ऐसे क्यों होने दे रहा है। ऐसे उत्पीड़क और घुटनभरे माहौल में मैं बड़ी हुई। जब मैं चौदह साल की हुई तोमेरी मां हम भाई बहिनों को लेकर घर छोड़कर आ गई।जिस रात हम निकले हमारे पिता ने हमें गाड़ी से कुचलने की कोशिश की। पिता से छुटकारा लेकर हम पांचों एक महान शख्स की शरण में चले गए। उस शख्स नेहम भाई-बहिनों को अपनी संतान की तरह रखा। यहां हमें ऐसा लगा मानों हम ईश्वर की कृपा में आ गए। यह शख्स नास्तिक होने के बावजूद भला आदमी था।इस बीच मैंने हाई स्कूल पास किया और मैं नौ सेना में भर्ती हो गई। मैं छठी मेरीन बटालियन की एक टुकड़ी में रेडियो ऑपेरटर थी। यह बटालियन अमेरिकाकी सबसे ज्यादा प्रतिष्ठित बटालियन होने के साथ ही खतरनाक जंग में हिस्सा लेने की काबिलियत रखती थी।हमारी बटालियन को मार्च 2008 में अफगानिस्तान केगार्मसिर में तालिबान से लडऩे के लिए भेजा गया। हमारी तालिबानियों से चार महीने तक जंग चलती रही। इसी जंग में हमारी एक साथी को गोली लगी। हमें आदेश मिला कि उस साथी की मदद की जाए ताकि उसे मेडिकल सहायता उपलब्ध कराई जा सके।दोनों तरफ गोलीबारी के बीच हम अपने साथी को बचाने की कोशिश के बीच ही एक गोली मेरे चेहरे के नजदीक सेदनदनाती हुई गुजरी। गोली नजदीक से गुजरने से मुझे दो दिनों तक अपने बाएं कान से कुछ भी सुनाई नहीं दिया। मुझे लगा मानो मौत मुझे छूकर चली गई हो। हमारे टीम लीडर ने हमें बता रखा था कि युद्ध के मोर्चे पर किसी को भी नास्तिक नहीं रहना चाहिए। मैं गोलीबारी के बीच आगे बढ़ती रही और ईश्वर से प्रार्थना करती रही कि वह मेरी हिफाजत करे।हालांकि सच्चाई यह है कि उस वक्त ईश्वर में मेरी सच्ची आस्था नहीं थी। हम उस घायल नौसेनिक को स्टे्रचर पर लेकर आगे बढ़े। मैंने उस घायल सैनिक को देखकर महसूस किया मानो उसकी आत्मा उसके शरीर कोछोड़कर बाहर आ रही हो।उसकी बंद होती आंखों ने मुझे ऐसा ही कुछ एहसास कराया। कुछ देर बाद डॉक्टर ने उस सैनिक को मृत घोषित कर दिया। नजदीक से साथी सैनिक की मौत देखने के बाद मुझे यकीन हुआ कि हर शख्स के आत्मा होती है और ईश्वर पक्के तौर पर है। जंग बंद होने के बाद हमने अफगानिस्तान के बाशिंदों और उनके कल्चर को जानना शुरू किया।एक रोज वहां मैंने सुबह की शांति के बीच जो नजारा देखा, वह अनूठा, दिलचस्प और यादगार रहा। सूर्योदय से पहले सभी अफगानी और मेरी दुभाषिया नमाज में मशगूल थी। मैं उनकी इस इबादत पर गौर कर रही थी। इस इबादत से मैं प्रभावित हुई। मैंने अपनी दुभाषिए से इसके बारे में पूछा तो उसने मुझे इस्लाम के बारे में जो कुछ बताया, वह मुझे अच्छा लगा।मैं वापस अमेरिका लौट आई। अमेरिका आने पर मैं फिर से अपने परिवार वालों के साथ चर्च जाने लगी। चर्च का मुझ पर कोई असर नहीं हुआ और मैंने यह कहते हुए चर्च जाना छोड़ दिया कि ईश्वर की प्रशंसा के लिए मुझे चर्च जाने की जरूरत नहीं है। जनवरी 2011 मेंमुझे सेना से छुट्टी मिल गई। क्लब-पार्टियों में जाना और मौज मस्ती करना मेरा शगल बन गया। मैं पार्टियों में मौज-मस्ती करने लगी। मैं हर तरह के नियम-कायदों से ऊपर थी।लॉस वेगास के एक क्लब में मेरे साथ एक बुरा हादसा पेश आया। मैंने शराब पी रखी थी। मेरे साथी क्लब से जा चुके थे। मैंने एक पुरुष से लिफ्ट ली जिसने मुझे और शराब पिलाई और मेरे साथ बलात्कार किया। मुझे कुछ होश न था। मुझे होश आया तो मैंने अपने घर के दरवाजे पर खुद को पाया। इस घटना से मैं बेहद दुखी और शर्मिंदा हुई।इस हादसे के बाद तो मेरा ईश्वर से भी भरोसा उठ गया और मैं उन लोगों से भी चिढऩे लगी जो ईश्वर में यकीनरखते थे। मैं आस्तिक लोगों से इस विषय पर विवाद करती कि ईश्वर का अस्तित्व है ही नहीं। मैं पूरी तरह नास्तिक हो गई और शराब के साथ ही ड्रग का भी सेवन करने लगी। पार्टियों में मौज-मस्ती पहले की तरह जारी रही। पड़ोस में एक बार और एक पार्टी के दौरान मेरे साथ बलात्कार की कोशिश हुई।इस बीच मैं नेवादा चली आई, इस उम्मीद से कि शायद यहां मैं खुद को बदल पाऊं, लेकिन मेरे यहां के दोस्तों का सर्किल भी नशेडिय़ों और नास्तिकों का था। मेरी नशे की लत बढ़ती ही गई। मैं अपने दोस्तों से ही मारपीट करने लगी। नशे का मुझ पर ऐसा असर होनेलगा कि एक बार तो मैं चार दिनों में सिर्फ तीन घंटेही सो पाई। एक बार तो लगभग नौ दिनों तक मैं जागती रही।मैं खुद को असहाय महसूस करने लगी। मुझे लगता ना तो कोई मुझे चाहता है, ना कोई मुझे किसी तरह का सहारा देता है। मैं हीन भावना से ग्रसित रहने लगी। इस सोच के चलते मैं लगभग एक हफ्ते रोती रही। मैंने सोचा क्यों न मैं बलात्कार पीडि़त गु्रप में शामिल होकर मदद हासिल करूं। इसी बीच एक तारस नाम की महिला से मेरी मुलाकात हुई। मानो ईश्वर ने उसे मेरी मदद के लिए भेजा हो।वह महिला अल्लाह में यकीन रखती थी। उसने मेरे से बात की, मुझे हौसला दिलाया और मुझे सबसे पहले मदद लेकर खुद को अच्छी तरह खड़ा करने के लिए तैयार किया। मैंने उससे अपने सैनिक जीवन और इस्लाम के बारे में भी चर्चा की। दरअसल उस वक्त तक मैं बेहद टूट चुकी थी और सोचती थी कि क्यों न मैं खुदकुशी करलूं। मेरी इस बिगड़ी हालत के चलते मुझो लॉस वेगास के हॉस्पिटल में भर्ती कराना पड़ा।हॉस्पिटल में मैंने अपनी दोस्त तारस का दिया हौसला और उससे हुई चर्चा के बारे में ठंडे दिमाग से सोचा। मैंने अपने सौतेले पिता से मेरे लिए कुरआन लाने के लिए कहा। मेरे पिता मेरे लिए कुरआन ले आए। मैंने हॉस्पिटल में ही कुरआन पढऩा शुरू कर दिया। कुरआन पढऩे से मुझो अच्छा महसूस होने लगा। मैं थोड़ी बहुत इबादत करने लगी। उसी अस्पताल में एक मुस्लिम कर्मचारी था जिसका नाम बशीर था।उसने जब मेरे कमरे पर लगे नोट- मुझे इबादत के लिए सुबह 4:20 बजे उठा दिया जाए- पढ़ा तो उसने मुझसे पूछा कि क्या मैं मुसलमान हूं? मैंने उसे बताया किमैं कोशिश कर रही हूं मुसलमान बनने की। उसने मुझे कुरआन के कुछ अध्याय और नमाज पढऩे के तरीके से संबंधित कुछ किताबें दी। उसने मुझे नमाज पढ़ाना भी सिखाया। मैं अब बेहतर महसूस करने लगी।ड्रग्स लेने की आदत के कारण अस्पताल वाले मुझो हाईपावर की दवा नहीं देते थे, फिर भी मुझे एहसास होने लगा कि मैं अच्छी होती जा रही हूं। मैंने लॉस वेगास के इस्लामिक सेंटर को टेलीफोन किया और इस्लाम सीखने के लिए मदद चाही तो उन्होंने दो अद्भुत स्त्रियों शाहीन और ऐलीजाबेथ को मेरे पास भेजा।मैंने इन्हीं दोनों महिलाओं की उपस्थिति में इस्लाम अपना लिया। ये दोनों मेरे इस्लाम का कलमा पढऩे की गवाह बनीं। मैंने गवाही दी कि सिवाय एक अल्लाह के कोई इबादत के लायक नहीं है और पैगम्बर मुहम्मद सल्ल.अल्लाह के बंदे और रसूल हैं। अविश्वसनीय रूप से उसी पल मैं खुद को बेहतर महसूस करने लगी।मैंने अपने आपको अल्लाह के सुपुर्द कर दिया। अब मैं इस्लामी पर्दा हिजाब पहनती हूं। अल्लाह की पनाह में आना मेरी जिंदगी में चमत्कार के समान हुआहै। मेरे पास अंग्रेजी अनुवाद वाला कुरआन है जिसे मैं पढ़ती हूं। मुझे तो यकीन भी नहीं हुआ कि अल्लाह ने सही राह दिखाने के लिए मुझे चुना। अब मेरे दिल को सुकून है। अपना पुराना अतीत से मैं अब उबर चुकी हूं। जिन लोगों ने मेरा शोषण किया था, मुझ पर जुल्म किया था, उन सबको मैंने माफ कर दिया है। मैंने उन लोगों के लिए दुआ भी की कि अल्लाह उनका मार्गदर्शन करे।अल्लाह को जान लेने के बाद उससे बड़ा कोई एहसास नहीं। अल्लाह की इबादत का समय मेरे लिए सबसे बेहतरवक्त होता है। पहले मैं सोचा करती थी कि धर्म तो कमजोरों के लिए होता है ताकि वे उसका सहारा ले सकें लेकिन अब मैं सोचती हूं कि अल्लाह के प्रति समर्पण के लिए हौसले और शक्ति की जरूरत होती है।इस्लाम अपनाने के बाद मैंने शराब पीना छोड़ दिया। सच्चरित्र रहती हूं। हिजाब पहनती हूं और इस्लाम की शिक्षा लोगों तक पहुंचाती हूं। मैं आपसे गुजारिश करती हूं कि आप मुझे मेरे गुजरे हुए वक्त के साथ न जाचें क्योंकि मैंने अल्लाह और उसकी श्रेष्ठ रचना को पहचान लिया है। अब मुझे मेरी जिंदगी का मकसद मिल गया है।आप सब बहिन भाइयों को मेरी यह कहानी बताने के पीछे मकसद यह बताना है कि आप कैसे भी हो, किस भी हालात में हो, अल्लाह आपका मार्गदर्शन करता है और आपको एकनेक इंसान बना देता है। मैं इसका जीता जागता उदाहरण हूं।मुझे उम्मीद है कि मेरी इस कहानी से सभी को अच्छा और नेक इंसान बनने की प्रेरणा मिलेगी। सब तरह की तारी फ अल्लाह ही के लिए है। अल्लाह से दुआ है कि वह हमारा मार्गदर्शन करे और हमें सीधी और सच्ची राह सुझाए और इस पर चलाए।इनपुट मुस्लिम वर्ल्ड से भी
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Sunday, 7 August 2016
Saturday, 6 August 2016
'मैं सिर्फ अल्लाह के सामने सिर झुकाता हूं'
नई दिल्ली।पाकिस्तान के प्रधानमंत्री और और सेनाप्रमुख के बीच टकराव बढ़ता जा रहा है। पाक पीएम नवाज शरीफ ने सेना के दखल को चुनौती देते हुए कहा कि वह सिर्फ अल्लाह और अवाम के सामने सिर झुकाते हैं।न्यूज़ २४ की रिपोर्ट के मुताबिक शरीफ ने कहा कि मेरी जवाबदेही सिर्फ अल्लाह और आवाम के प्रति बनती है। उन्होंने यह भी कहा कि पनामा पेपर्स लीक में अपने और परिवार के सदस्यों के नाम आने की अफवाह से मैं आहत हूं। इस मामले में किसी भी जांच के लिए पूरी तरह से तैयार हूं। पाक सेना प्रमुख राहील शरीफ द्वारा छह वरिष्ठ अधिकारियों को भ्रष्टाचार के आरोप में निकालने के बाद शरीफ ने नैशनल टीवी के जरिए अपनी सफाई दी।आर्मी चीफ ने अधिकारियों को बर्खास्त करते हुए कहा कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई भ्रष्टाचार के रहते नहीं जीती जा सकती। पाकिस्तानी पीएम ने आर्मी चीफ द्वारा छह अधिकारियों को निकालने के ठीक अगले ही दिन नैशनल टीवी के जरिए जनता को संबोधित किया। आर्मी चीफ की कार्रवाई के बाद नवाज शरीफ पर दबाव था।जनरल राहील शरीफ ने क्या कहा थाजनरल राहील शरीफ ने अधिकारियों को बर्खास्त करने के बाद कहा था, 'आतंक के खिलाफ जारी हमारी जंग भ्रष्टाचार के रहते कभी जीती नहीं जा सकती है। इसलिए भ्रष्टाचार को जड़ से मिटाने के खातिर हम सबको अपनी जवाबदेही तय करनी ही होगी।' जनरल शरीफ कायह निशाना सीधे तौर पर प्रधानमंत्री के लिए माना जा रहा था। इसके बाद अपने टीवी संबोधन में PM नवाज शरीफ ने आक्रामक अंदाज में स्पष्ट किया कि धमकियों से वह डरने वाले नहीं हैं।सैन्य प्रमुख परवेज मुशर्रफ द्वारा खुद को अपदस्थकिए जाने की घटना का भी शरीफ ने टीवी संबोधन में जिक्र किया। उन्होंने कहा, 'एक प्रधानमंत्री (नवाजशरीफ) को जबरन पद से हटाकर हथकड़ी पहनाकर पहले जेल में और फिर निर्वासन पर जाने के लिए मजबूर किया गया था। आज मेरा इस्तीफा मांगने वालों ने उस वक्त क्यों नहीं इसके विरोध में सुप्रीम कोर्ट क्यों नहीं गए थे?'उन्होंने खुद पर और अपने परिवार पर आरोप लगाने वालों को चुनौती देते हुए कहा, 'अगर आरोपों में थोड़ी भी सच्चाई निकली तो मैं तत्काल अपने पद से इस्तीफा दे दूंगा। मैं खुद मुख्य न्यायधीश को पत्र लिखकर एक कमिशन बनाने की सिफारिश करूंगा। कमिशन मुझ पर लगे आरोपों की निष्पक्ष जांच करने केलिए स्वतंत्र है। अगर मुझ पर लगाए गए आरोप गलत साबित हुए तो क्या आज जो लोग मुझे और मेरे परिवार को बुरा-भला कह रहे हैं, वो राष्ट्र से माफी मांगेंगे?'
कयामत का समय बताने वाली घड़ी में बचे हैं 'तीन मिनट'
शिकागो।दुनिया के खात्मे की चेतावनी देने के लिए बनाई गई काल्पनिक घड़ी का समय मध्यरात्रि से तीन मिनट पहले का तय कर दिया गया है। यानी दुनिया बर्बादी की कगार पर काफी करीब पहुंच गई है। परमाणुखतरे, ग्लोबल वॉर्मिंग को देखते हुए बुलेटिन ऑफ एटॉमिक साइंटिस्ट्स ने यह फैसला किया है।डूम्सडे क्लॉक यानी धरती पर मंडरा रहे खतरों का आकलन करने वाले वैज्ञानिकों का कहना है कि बीते तीन साल में क्लाइमेट चेंज और परमाणु हथियारों के कारण धरती पर मंडरा रहा खतरा इतना बढ़ गया है कि वहकभी भी अंत के करीब पहुंच सकती है।इसी के मद्देनजर उन्होंने इस काल्पनिक डूम्सडे क्लॉक को रात्रि 12 बजे से तीन मिनट पहले पर सेट कर दिया गया है। इसका मतलब हुआ कि धरती के सफाये काखतरा बहुत ज्यादा है।इस घड़ी को 68 साल पहले शुरू किया गया था। शिकागो के अटॉमिक साइंटिस्ट्स के बुलेटिन को तैयार करने वाले लोग ही इस क्लॉक को सेट करते हैं। बुलेटिन ऑफ द एटॉमिक साइंटिस्ट्स के एक्िजक्यूटिव डायरेक्टररैशल ब्रॉन्सन ने बताया कि पिछले 20 सालों में यह बर्बादी के काफी करीब पहुंच गई है।एरिजोना स्टेट यूनिवर्सिटी के कॉस्मोलॉजिस्ट और प्रोफेसर लॉरेंस क्रूस ने बताया कि ग्लोबल वॉर्मिंग, आतंकवाद, अमेरिका और रूस के बीच परमाणु तनाव, उत्तर कोरिया के हथियारों की चिंता, पाक-भारतके बीच तनाव अस्थिरता फैलाने वाले हैं। उन्होंने कहा कि वर्ष 2015 से इस घड़ी के समय में बदलाव नहीं करना अच्छी बात नहीं है।क्या है डूम्सडे क्लॉकयह धरती पर मंडरा रहे खतरों का आकलन करने वाली एक काल्पनिक घड़ी है। इसे 1947 में बनाया गया था, जिसमें शुरुआती टाइम 7 से 12 मिनट रखा गया था। तब हिरोशिमा और नागासाकी पर एटमी हमले हुए थे। इसके बाद से 18 बार मिनट सुई को आगे या पीछे किया जा चुका है।इससे पहले 2012 में भी मिनट सूई बढ़ाई गई थी और तबभी परमाणु बम और क्लाइमेट चेंज का खतरा बताया गया था। इसे सेट करने वाली टीम में 16 नोबेल पुरस्कार विजेता हैं और इस क्लॉक को काफी गंभीरता से लिया जाता है।जब धरती के अस्तित्व को लेकर खतरे की स्थिति बनती है, तो मिनट की सुई को रात्रि 12 बजे के करीब कर दिया जाता है। जब संपन्नता होती है, तो इसके समय को बढ़ा दिया जाता है। 1953 में इसे 12 बजने में दो मिनट पहले तय किया गया था और 1991 में 17 मिनट पहले तय किया गया था।
ईरान में एक ही दिन में 20 सुन्नी कैदियोंको फांसी
तेहरान।ईरान ने हत्या और अन्य अपराधों के लिए एक ही दिन में 20 “आतंकवादी” सुन्नी क़ैदियों को फ़ांसी पर लटका दिया। सरकारी मीडिया के अनुसार “इनलोगों ने महिलाओं और बच्चों की हत्या की थी। इन्होंने कुछ कुर्दिश इलाक़ो में सुन्नी धार्मक नेताओं की भी हत्या की थी और देश के ख़िलाफ काम किया था।IRIB टेलीविज़न के अनुसार महाभियोजक जनरल मोहम्मदजावेद मुंतज़िर ने कहा कि ये फ़ासियां मंगलवार को दो गईं। ईरान के गुप्तचर मंत्रालय ने बुधवार को एकबयान जारी कर बताया ता कि 2009 और 2011 के बीच 24 सशस्त्र हमले हुए जिसमें बमबारी और डकैती भी शामिल है।
महिलाओं ने बुर्का जलाकर मनाया ISIS से आजादी का जश्न
नई दिल्ली।सीरिया के मानबिज शहर को आईएस के चंगुलसे छुड़ा लिया गया है। यूएस आर्मी की मदद से सीरिया डेमोक्रेटिक फोर्स ने मानबिज पर अपना वापसकब्जा कर लिया है। इस जीत से वहां की जनता इतनी उत्साहित थी कि उन्होंने सड़कों पर रैलियां निकालीं। जश्न मानने में सीरिया की महिलाएं भी पीछे नहीं रही, उन्होंने बुर्का जलाकर आजादी का जश्न मनाया।सीरियन कुर्दिश न्यूज एजेंसी आन्हा ने इन महिलाओंका वीडियो जारी किया है। गौरतलब है कि आईएस का यहां 2014 से कब्जा था। पिछले तीन साल से आईएस के आतंकी यहां की महिलाओं का उत्पीड़न कर रहे थे। उन्हें सेक्स स्लेव बनाया जाता, जानवरों की तरह खरीदा और बेचा जाता था।इससे पहले आईएस के चंगुल से छूटकर आई कुर्दिश महिलाएं और लड़कियां ने भी आजादी का जश्न कुछ इस तरह ही मनाया था। आईएस से उनकी नफरत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जैसे ही वो कुर्दिश इलाके में पहुंचीं तो उन्होंने अपने बदन से काले हिजाब और बुर्के उतार कर फेंक दिए और जोर जोर से बगदादी के खिलाफ नारे लगाए।
ए सियासत वालो जान हमने भी गंवाई है वतन की ख़ातिर...
लखनऊ। 'कुछ लोगों' की वजह से पूरी मुस्लिम क़ौम को शक की नज़र से देखा जाने लगा है... इसके लिए जागरूक मुसलमानों को आगे आना होगा... और उन बातों से परहेज़ करना होगा जो मुसलमानों के प्रति 'संदेह' पैदा करती हैं... कोई कितना ही झुठला ले, लेकिन यह हक़ीक़त है कि हिन्दुस्तान के मुसलमानों ने भी देश के लिए अपना खू़न और पसीना बहाया है. हिन्दुस्तान मुसलमानों को भी उतना ही अज़ीज़ है, जितना किसी और को... यही पहला और आख़िरी सच है... अब यह मुसलमानों का फ़र्ज़ है कि वो इस सच को 'सच' रहने देते हैं... या फिर 'झूठा' साबित करते हैं...इस देश के लिए मुसलमानों ने अपना जो योगदान दिया है, उसे किसी भी हालत में नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता. कितने ही शहीद ऐसे हैं, जिन्होंने देश के लिएअपनी जान तक कु़र्बान कर दी, लेकिन उन्हें कोई याद तक नहीं करता. हैरत की बात यह है कि सरकार भी उनका नाम तक नहीं लेती. इस हालात के लिए मुस्लिम संगठन भी कम ज़िम्मेदार नहीं हैं. वे भी अपनी क़ौम और वतनसे शहीदों को याद नहीं करते.हमारा इतिहास मुसलमान शहीदों की कु़र्बानियों से भरा पड़ा है. मसलन, बाबर और राणा सांगा की लड़ाई में हसन मेवाती ने राणा की ओर से अपने अनेक सैनिकों के साथ युध्द में हिस्सा लिया था. झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की दो मुस्लिम सहेलियों मोतीबाई और जूही ने आख़िरी सांस तक उनका साथ निभाया था. रानी के तोपची कुंवर गु़लाम गोंसाई ख़ान ने झांसी की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहूति दी थी. कश्मीर के राजा जैनुल आबदीन ने अपने राज्य से पलायन कर गए हिन्दुओं को वापस बुलाया और उपनिषदों के कुछ भाग का फ़ारसी में अनुवाद कराया. दक्षिण भारत के शासक इब्राहिम आदिल शाह द्वितीय ने सरस्वती वंदना के गीत लिखे. सुल्तान नाज़िर शाहऔर सुल्तान हुसैन शाह ने महाभारत और भागवत पुराण का बंगाली में अनुवाद कराया. शाहजहां के बड़े बेटेदारा शिकोह ने श्रीमद्भागवत और गीता का फ़ारसी में अनुवाद कराया और गीता के संदेश को दुनियाभर में फैलाया.गोस्वामी तुलसीदास को रामचरित् मानस लिखने की प्रेरणा कृष्णभक्त अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना से मिली. तुलसीदास रात को मस्जिद में ही सोते थे. 'जय हिन्द' का नारा सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिन्द फ़ौज के कप्तान आबिद हसन ने 1942 में दिया था, जो आज तक भारतीयों के लिए एक मंत्र के समान है. यह नारा नेताजी को फ़ौज में सर्वअभिनंदन भी था.छत्रपति शिवाजी की सेना और नौसेना के बेड़े में एडमिरल दौलत ख़ान और उनके निजी सचिव भी मुसलमान थे. शिवाजी को आगरे के क़िले से कांवड़ के ज़रिये क़ैद से आज़ाद कराने वाला व्यक्ति भी मुसलमान ही था. भारत की आज़ादी के लिए 1857 में हुए प्रथम गृहयुध्द में रानी लक्ष्मीबाई की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी उनके पठान सेनापतियों जनरल गुलाम ग़ौस ख़ान और ख़ुदादा ख़ान की थी. इन दोनों ही शूरवीरों ने झांसी के क़िले की हिफ़ाज़त करते हुए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए. गुरु गोबिन्द सिंह केगहरे दोस्त सूफ़ी बाबा बदरुद्दीन थे, जिन्होंने अपने बेटों और 700 शिष्यों की जान गुरु गोबिन्द सिंह की रक्षा करने के लिए औरंगंज़ेब के साथ हुए युध्दों में कु़र्बान कर दी थी, लेकिन कोई उनकी क़ुर्बानी को याद नहीं करता. बाबा बदरुद्दीन का कहना था कि अधर्म को मिटाने के लिए यही सच्चे इस्लाम की लड़ाई है.अवध के नवाब तेरह दिन होली का उत्सव मनाते थे. नवाबवाजिद अली शाह के दरबार में श्रीकृष्ण के सम्मान में रासलीला का आयोजन किया जाता था. नवाब वाजिद शाह अली ने ही अवध में कत्थक की शुरुआत की थी, जो राधा और कृष्ण के प्रेम पर आधारित है. प्रख्यात नाटक 'इंद्र सभा' का सृजन भी नवाब के दरबार के एक मुस्लिम लेखक ने किया था. भारत में सूफ़ी पिछले आठ सौ बरसों से बसंत पंचमी पर 'सरस्वती वंदना' को श्रध्दापूर्वक गाते आए हैं. इसमें सरसों के फूल औरपीली चादर होली पर चढ़ाते हैं, जो उनका प्रिय पर्व है. महान कवि अमीर ख़ुसरो ने सौ से भी ज़्यादा गीत राधा और कृष्ण को समर्पित किए थे. अमृतसर के स्वर्ण मंदिर की बुनियाद मियां मीर ने रखी थी. इसी तरह गुरु नानकदेव के प्रिय शिष्य व साथी मियां मरदाना थे, जो हमेशा उनके साथ रहा करते थे. वह रबाब के संगीतकार थे. उन्हें गुरुबानी का प्रथम गायक होने का श्रेय हासिल है. बाबा मियां मीर गुरु रामदास के परम मित्र थे. उन्होंने बचपन में रामदासकी जान बचाई थी. वह दारा शिकोह के उस्ताद थे. रसखान श्रीकृष्ण के अनन्य भक्तों में से एक थे जैसे भिकान, मलिक मोहम्मद जायसी आदि. रसखान अपना सब कुछ त्याग कर श्रीकृष्ण के प्रेम में लीन हो गए. श्रीकृष्ण की अति सुंदर रासलीला रसखान ने ही लिखी.श्रीकृष्ण के हज़ारों भजन सूफ़ियों ने ही लिखे, जिनमें भिकान, मलिक मोहम्मद जायसी, अमीर ख़ुसरो, रहीम, हज़रत सरमाद, दादू और बाबा फरीद शामिल हैं. बाबा फ़रीद की लिखी रचनाएं बाद में गुरु ग्रंथ साहिब का हिस्सा बनीं.बहरहाल, मुसलमानों को ऐसी बातों से परहेज़ करना चाहिए, जो उनकी पूरी क़ौम को कठघरे में खड़ा करती हैं...जान हमने भी गंवाई है वतन की ख़ातिरफूल सिर्फ़ अपने शहीदों पे चढ़ाते क्यों हो...
नाकामी सरकार की,गिरफ्तार होंगे मुस्लिम धियान भटकाने को।
हैदराबाद। ये अक्सर देखा गया है कि जैसे ही कोई त्यौहार नज़दीक आता है, मुसलमान युवकों की गिरफ़्तारी शुरू हो जाती है. बहाना दिया जाता है कि ये लोग आतंकवाद की गतिविधियों में शामिल हो सकते हैं और अक्सर जब जांच होती है तो मालूम होता है कि ज़्यादातर युवक बेगुनाह थे. अब जबकि स्वतंत्रता दिवस नज़दीक आ रहा है तो ऐसा अंदेशा है कि फिर ऐसा होगा। सिआसत की एक खबर के मुताबिक क्रांतिकारी कवि वरा वरा राव का मानना है कि सरकार जो कि हर तरह से नाकामयाब दिखाई पड़ती है अपनी नाकामियों को छुपानेके लिए ये सब करती है.नाकामी को छुपाने के इस तरीक़ेकी वजह से समाज में एक कटाव की स्थिति पैदा हो रही है और हिन्दू-मुस्लिम द्वेष की भावना बढ़ रही है.उन्होंने कहा कि इसे रोकने के लिए एक मज़बूत प्रतिरोध की ज़रुरत है. उन्होंने कहा कि मुसलमानों,दलितों और आदिवासियों को एक साथ आ जाना चाहिए ताकिकेन्द्र सरकार अपने इस मक़सद में कामयाब ना हो पाए. उन्होंने कहा कि सरकार ना तो काला धन ही भारत में वापिस ला पायी और ना ही “अच्छे दिन” के वादे पूरे हुए.
सऊदी सरकार भेजेगी अपने खर्च पर भारत के लालो को भेजेगी वापस!
सऊदी अरब में फंसे 10,000 भारतीयों के लिए राहत देने वाली खबर आई है। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने लोकसभा और राज्यसभा में शून्यकाल के दौरान एक समान वक्तव्य देते हुए कहा कि सऊदी अरब में फंसे भारतीय मजदूरों की समस्याओं को वहां के शासकों के संज्ञान में लाया गया है और उन्होंने समस्याओं के तत्काल समाधान का भरोसा दिया है। सऊदी सरकार वहां फंसे बेरोजगार भारतीय श्रमिकों को दूसरी नौकरियां उपलब्ध कराने तथा बकाए वेतन के भुगतान के लिए ठोस कदम उठा रही है।न्यूज़ २४ की रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने कहा कि विदेश राज्यमंत्री वी के सिंह परसों रात को ही सऊदी अरब पहुंच गए थे और वहां के मंत्रियों तथा अधिकारियों से बातचीत कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि जो श्रमिक स्वदेश लौटना चाहते हैं, उन्हें एक्जिट वीजा उपलब्ध कराया जाएगा तथा सऊदी सरकार अपने खर्चे पर उन्हें भारत भेजेगी। इसके साथ ही जोश्रमिक दूसरी कम्पनियों में काम करना चाहते हैं, उन्हें उनकी योग्यता के अनुसार दूसरी कम्पनियों में रोजगार उपलब्ध कराये जाएंगे।विदेश मंत्री ने कहा कि जो श्रमिक वापस भारत लौटेंगे, वे सऊदी अरब के श्रमिक कार्यालय में कFम्पनियों पर बकाये राशि का दावा भी करेंगे ताकि घर लौटने के बाद उनकी बकाया राशि का भुगतान किया जा सके। उन्होंने कहा कि भारतीय श्रमिक सऊदी अरब के जिन शिविरों में रह रहे हैं, उन्हें वहां की सरकार आज से भोजन भी उपलब्ध कराएगी। इसके साथ ही सऊदी सरकार ने शिविरों की साफ सफाई और चिकित्सा सुविधा भी प्रदान करने का वादा किया है।
हजरत अली के हाथ से लिखी कुरआन का हुआ प्रदर्शन मोरेकको में।
रामपुर/नई दिल्ली।फेस्टीवल आॅफ इण्डिया 2016 केअन्तर्गत मोरक्को में संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार और भारतीय उच्चायोग, मोरक्को के सहयोग से चल रही रामपुर रज़ा लाइब्रेरी की 41 दुर्लभ एवं प्राचीन कैलीग्राफियों के चित्रों की रबात में लगी प्रदर्शनी का समापन 1 अगस्त, 2016 को हो गया। अब यह प्रदर्शनी मोरोक्को के शहर कैसाब्लांका मेंदुनिया की सातवीं सबसे बड़ी मस्जिद हसन-प्प् में 4 अगस्त 2016 से प्रदर्शित की गई है, जिसका उद्घाटन मिस बाॅचरा जौहरी, लाइब्रेरियन, किंग हसन-प्प् मस्जिद पुस्तकालय, मोरक्को के कर-कमलों द्वारा किया गया। यह प्रदर्शनी 4 से 8 अगस्त 2016 तक प्रदर्शित की जायेगी। इस अवसर पर मिस बाॅचरा जौहरी, लाइब्रेरियन, किंग हसन-II मस्जिद पुस्तकालय, मोरक्को ने कहा कि पूरे विश्व भर में भारतीय संस्कृति बहुत प्रसिद्ध है। विश्व के बहुत रोचक और प्राचीन संस्कृति के रुप में इसको देखा जाता है। अलग-अलग धर्मों, परंपराओं, भोजन, वस्त्र इत्यादि से संबंधित लोग यहाँ रहते हैं। विभिन्न संस्कृति और परंपरा के लोग यहाँ सामाजिक रुप से स्वतंत्र हैं। इसी वजह से धर्मों की विविधता में एकता के मजबूत संबंधों का यहाँ अस्तित्व है। विभिन्न संस्कृति और परंपरा के लोगों के बीच की घनिष्ठता ने एक अनोखा देश “भारत“ बनाया है। साथ ही कहा कि रामपुर रज़ा लाइब्रेरी की कैलीग्राफियाँ विश्व में एक अद्वितीय स्थान रखती हैं। उन्होंने रज़ा लाइब्रेरी का गुणगान करते हुए कहा कि रामपुर रज़ा लाइब्रेरी इण्डो-इस्लामिक शिक्षा और कला का ख़जाना है।इस अवसर पर रामपुर रज़ा लाइब्रेरी की ओर से श्री सैयद तारिक़ अज़हर, वरिष्ठ तकनीकी रेस्टोरर ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि इस्लामी समाज में उच्च कलाकारों के बीच में सुलेखकों का अपना एक स्थान है और यह स्थान उनकी कला-कुशलता एवं निपुणताकी श्रेष्ठता के आधार पर प्राप्त होता है। भारत में जीवन, इतिहास, कला और संस्कृति के स्वरूप को हमेशा मिश्रित और युग के आधार पर समग्र किया गया है। भारत की रचनात्मक प्रतिभा के इस अनूठे पहलू ने विश्व के विभिन्न देशों को प्रभावित किया है तथा भारत ने विश्व संस्कृति और अतीत में सभ्यता में काफी योगदान दिया है और यह प्रक्रिया अभी भी जारी है। कहा कि रामपुर रज़ा लाइब्रेरी गौरवान्वित महसूस करती है कि लाइब्रेरी के संग्रह में लगभग 3000 दुर्लभ एवं प्राचीन कैलीग्राफियों के नमूने हैं। इस प्रदर्शनी का मुख्य आकर्षण सातवीं सदी में हज़रत अली (रजि0) के हाथ से लिखी कुरान शरीफ की प्रतिलिपि है। कैलीग्राफियों के चित्रों में 9वीं सदी के इमाम रज़ा द्वारा हाथ से कूफ़ी लिपि में लिखित कुरान का एक पेज का चित्र, 16वीं सदी के कुरान का पेज जिसे अकबर बादशाह ने सोने से सजवाया था और जिस पर अकबर के मंत्री फै़जी के हस्ताक्षर और मुहर है, 1887 ई0 की गुलाम रसूल की कैलीग्राफी,1871 ई0 की मिर्ज़ा मुहम्मद गुलाम खान की तोते, कबूतर और हंस के आकार के रुप मे सुन्दर कैलीग्राफी,1888 ई0 की मुहम्मद हसन कश्मीरी की कैलीग्राफी, 1878 ई0 की गुलाम रसूल की कैलीग्राफी, 18वीं सदी की मुहम्मद हसन की कैलीग्राफी जिसके बीच में बिस्मिलाह-अल-रहमान-निर-रहीम और दायीं और बायीं तरफ फ़ारसी भाषा की पंक्तियां लिखी हुई हैं, 1936 ई0 की दुल्लाह ख़ान ख़ुशरक़म रामपुरी की कैलीग्राफी, 18वीं सदी की मुहम्मद फजल-उर-रहमान खां की कैलीग्राफी, 18वीं सदी की मोहम्मद हसन की कैलीग्राफी और कुछ अरबी कैलीग्राफियों में पैगम्बर साहब (र0अ0व0) के रूप और सुन्दरता का वर्णन है इत्यादि को प्रदर्शित किया जा रहा है। इस अवसर पर श्री हिमांशु सिंह, मीडिया प्रभारी, रामपुर रज़ा लाइब्रेरी ने सभी का आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर कैसाब्लांका शहर के विद्वान, शोधकर्ता एवं गणमान्य व्यक्ति और विभिन्न देशों के दूत भी उपस्थित रहे।
अल्लाह कहने पर मुस्लिम दंपती को प्लेन से उतारा
नई दिल्ली। पाकिस्तानी मूल के एक अमेरिकी दंपती को विमान से उतारने का मामला सामने आया है। इस मुस्लिम दंपती ने दावा किया कि उन्हें विमान से महज इसलिए उतार दिया गया क्योंकि उनके अल्लाह कहने, पसीने निकलने और फोन पर एसएमएस करने से विमानमें सवार क्रू की एक सदस्य असहज महसूस कर रही थी। यह घटना 26 जुलाई की है और यह कपल अपनी शादी की दसवीं सालगिरह मनाकर अमेरिका लौट रहा था।मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार नाजिया और फैसल अली ने डेल्टा एयरलाइंस पर आरोप लगाया कि पैरिस से ओहायो के सिनसिनाटी जाने के दौरान इस्लामोफोबिया के कारण उन्हें विमान से उतार दिया गया। मीडिया रिपोर्ट में कहा गया कि डेल्टा एयरलाइंस के विमान में पैरिस से सिनसिनाटी जाने के लिए मुस्लिम दंपती अपनी सीट पर बैठ चुका था। सीट पर बैठने के बाद महिला ने अपने जूते उतार दिए और इसी दौरान उसने अपने अभिभावकों को एसएमएस भेजा। वह मोबाइल फोन का इस्तेमाल कर रही थी और उसने हेडफोन लगा रखा था।द सिनसिनाटी इन्क्वायरर की खबर के अनुसार, विमान के एक क्रू सदस्य ने पायलट से शिकायत की थी कि वह मुस्लिम दंपती से असहज महसूस कर रही है। उसने पायलट से कहा कि महिला सिर पर स्कार्फ बांधे हुए है और फोन का इस्तेमाल कर रही है और व्यक्ति को पसीना आ रहा है। विमान एयरहोस्टेस ने यह भी दावा किया कि फैसल ने अपना फोन छिपाने का प्रयास किया और उसने दंपती को अल्लाह शब्द का इस्तेमाल करते सुना।
सबसे ज्यादा मशहूर वैज्ञानिक मुस्लिम दुनिया से थे।परवेज़ अमिरालि
7 जनवरी 2016 को नाभिकीय भौतिक विज्ञानी , मशहूर दूरदर्शन शख्सियत व लेखक परवेज अमिराली हुडभोय हैदराबाद साहित्य समारोह में शिरकत करने आये थे . परवेज अमीराली भारतीय व विश्व विज्ञान पर ख़िताब करते हुवे कहा कि " मुसलमानों को तरक्की व याफ्ता के लिए विज्ञान से अवश्य जुड़ना चाहिए . आज भारत , पाकिस्तान , बांग्लादेश , इंडोनेशिया व विभिन्न देशों के मुसलमानों की बदहाली की वजह यह है कि वह साइंसी उलूम के साथ मजबूती से नही जुड़ रहे हैं । अपने ख़िताब में मुसलमानों की बदहाली व तररकी अक़ीदे व इतिहास पर भी रौशनी डाला ."मैंने साइंस और टेक्नोलॉजी से सम्बंधित बहुत से किताबों का अध्यन किया और पाया की साइंस वह इल्म है जो धर्म व कौमियत , रंग व नस्ल और इलाके के नज़रये से ऊपर है ।चार से पांच सौ साल पहले साइंसी उलूम की तरक़्क़ी के छेत्र - इल्मे रियाजी ( गणित - Mathematics ), इल्मे नबातात ( Botony ) , इल्मे तबिआत ( भौतिकी - Physics ), इल्मे कीमिया ( रासायनिक शास्त्र - Chemistry ) व मेडिकल साइंस में मुस्लिम वैज्ञानिक का दबदबा था जो आज धीरे धीरे काम होते गया । इल्मे रियाजी ( गणित ) अरब वालों का पसंदीदा विषय रहा है । मुहम्मद बिन मूसा ख्वारिज़्मी , जिसे यूरोप में अल्गोरिज़्म के नाम से जाना जाता है . आप ने रियाजी ( हिसाब ) , फल्कीयात ( आसमानी चीजो से संबंधित चीज ) , जुगराफिया ( भूगोल- Geography ) और इतिहास में असाधारण कारनामे सर - अंजाम दिये । ख्वारिज़्मी दुनिया के पहले इल्मे रियाज ( गणित ) के जानकार थे जिन्होंने शून्य का इज़ाद ( आविष्कार) किया ।
क़ुरआन की तासीर ने मुझे बना दिया मुस्लिम।
मोहतरमा मरयम जमीला न्यूयार्क (अमेरिका) के एक यहूदी परिवार में पैदा हुई। इस्लाम कबूल करने से पहले ही वे आम अमेरिकी व यहूदी औरतों से हटकर शिष्ट ढंग से जिन्दगी गुजार रही थीं। मुसलमान होने के बाद उन्होंने इस्लाम पर अनेक पुस्तकों की रचनाएं की हैं। अब तक उनकी एक दर्जन से अधिक अंग्रेजी रचनाएं लोगों के सामने आ चुकी हैं। अपने बारे में वे कहती हैं कि कुरआन से मेरा परिचय अजीब तरीके से हुआ। मैं बहुत छोटी थी जब मुझे संगीत से बहुत लगाव हो गया। बहुत -से गीतों और क्लासिकल रिकार्ड बहुत देर-देर त· मेरे कानों को लोरियां देते रहते। मेरी उम्र लगभग 11 वर्ष की थी, जब एक दिन सिर्फ इत्तिफाक से मैंने रेडियो पर अरबीसंगीत सुन लिया, जिसने दिल व दिमाग को खुशी के एक अजीब एहसास से भर दिया। नतीजा यह हुआ कि मैं खाली समय में बड़े शौक से अरबी संगीत सुनती, यहां तक कि एक समय आया कि मेरी अभिरुचि ही बदल गयी। मैं अपने पिता के साथ न्यूयार्क के सीरियाई दूतावास में गयी और अरबी संगीत के बहुत- से रिकार्ड ले आयी। उन्हीं में सूरह मरयम की चित्ताकर्ष· तिलावत भी थी, जो उम्मे कुलसुम की निहायत सुरीली आवाज में रिकार्ड की गयी थी। हालांकि मैं उन गीतों को समझ नहीं सकती थी मगर अरबी जुबान की आवाजों और सुरों से मुझे बेहद मुहब्बत हो गयी थी। सूरह मरयम ·ी तिलावत तो मेरे ऊपर जादू ·र देती थी। अरबी जुबान सेइस गहरे लगाव ही का नतीजा था कि मैंने अरबों के बारे में किताबें पढऩी शुरू की। खास तौर से अरबों और यहूदियों के संबंध पर ढूंढ-ढूंढ कर किताबें हासिल की और यह देखकर बहुत हैरान हुई कि यद्यपि धारणा की दृष्टि से यहूदी और अरब एक दूसरे के बहुत करीब हैं मगर यहूदी इबादतखानों में फिलिस्तीनी अरबों के विरूद्ध बहुत जबरदस्त जहर उगला जाता है। साथ ही ईसाइयों के व्यवहार ने मुझे बहुत निराश किया। मैंने ईसाइयत को गोरखधंधे के अलावा कुछ न पाया। चर्च ने बहुत-से अखलाकी, सियासी, आर्थिक और सभ्यतागत खराबियों का सिलसिला शुरू कर रखा था, इससे खास तौर से मैं परेशान हुई। मैंने यहूदी और ईसाई इबादतखानों को बहुत करीब से देखा और दोनों कोमुनाफिकत (कपटाचार) और बुराई की दलदल में डूबे हुएपाया। मैं यहूदी थी, इसलिए यहूदियत का अध्ययन करते हुए जब मैंने महसूस किया कि इस्लाम तारीखी एतबार से यहूदियत के बहुत करीब है तो फितरी तौर पर इस्लाम और अरबों के बारे में जानने का शौक पैदा हुआ। 1953 ई। के गर्मी के मौसम में मैं बहुत ज्यादा बीमार पड़ गयी।मैं बिस्तर पर लेटी थी जब एक शाम मेरी मां ने पब्लिक लाइब्रेरी जाते हुए मुझसे पूछा कि मैं कोई किताब तो नही मंगाना चाहती तो मैंने कुरआन के एक नुस्खे की फरमाइश की और वे आती हुई जार्ज सैल का अनुवाद किया हुआ कुरआन ले आयीं और इस तरह कुरआन से मेरे संबंध की शुरूआत हुई। जार्ज सैल 18वीं शताब्दी का ईसाई विद्वान और प्रचारक थे, मगर थे बहुत कट्टर धार्मिक और तंगनजर। उनके अनुवाद की भाषा कठिन है और टिप्पणियों में अनावश्यक विषयों से हटकर हवाले दिये गये हैं, ताकि ईसाई दृष्टिकोण से उसे गलत साबित किया जा सके। एक बार तो मैं उन्हें बिल्कुल न समझ सकी मगर मैंने उसका अध्ययन करना न छोड़ा और उसे तीन दिन और रात बराबर पढ़ती रही यहां तक कि थक गयी। उन्हीं दिनों किस्मत ने साथ दिया और पुस्तकों की एक दुकान पर मैंने मुहम्मद मार्माडियूक पिकथॉल का अनुवाद देखा। ज्यों ही मैंने उस कुरआन को खोला, मुझे एक जबरदस्त चीज मालूम हुई। जुबान का हुस्न और बयान की सादगी मुझे अपने साथ बहा ले गयी। भूमिका के पहले ही अनुच्छेद में अनुवादक ने बहुत खूबसूरत तरीके से स्पष्ट किया है कि यह कुरआनी अर्थों को जैसा कि आम मुसलमान इसे समझते हैं, अंग्रेजी भाषा में पेश करने की एक कोशिश है और जो शख्स कुरआन पर यकीन नहींरखता उसके लिए अनुवाद का हक अदा नहीं कर सकता। दुनिया में कोई भी अनुवाद अरबी कुरआन की जगह नहीं ले सकता आदि। मैं तुरन्त समझ गयी कि जार्ज सैल का अनुवाद नागवार क्यों था? अल्लाह तआला पिकथॉल को बहुत-सी रहमतों से नवाजे।उन्होंने ब्रिटेन और अमेरिका में कुरआन को समझना आसान बना दिया और मेरे सामने भी रोशनियों के दरवाजे खोल दिये। मैंने इस्लाम में हर वह अच्छी, सच्ची और हसीन चीज पाई जो जिन्दगी और मौत को मकसद देती है जबकि दूसरे धर्मों में हक मिटकर रह गया है, उसको टुकड़ों में बांट दिया गया है, उसके आस-पास कईतरह के घेरे खींच दिये गये हैं। कुरआन और उसके बाद मुसलमानों की तारीख के अध्ययन से मुझे यकीन हो गयाकि अरबों ने इस्लाम को महान नहीं बनाया बल्कि यह इस्लाम है जिसकी वजह से अरब दुनिया भर में कामयाब हुए। मेरी बीमारी बरसों तक रही, यहां तक कि 1959 ई। में पूरी तरह से स्वस्थ होकर मैंने अपना अधिक समय पब्लिक लाइब्रेरी न्यूयार्क में गुजाराना शुरू किया। यहीं पर मुझे पहली बार हदीस की मशहूर किताब मिशकातुल-मसाहीब के अंग्रेजी अनुवाद की चारमोटी जिल्दों से परिचय हुआ। यह कलकत्ता के मौलाना फजलुर्रहमान की कोशिशों का नतीजा थी। तब मुझे अंदाजा हुआ कि हदीस के संबंधित हिस्सों से परिचय के बगैर कुरआन पाक को मुनासिब और विस्तृत ढंग से समझना मुमकिन नहीं। जाहिर है पैगम्बर अलैहिस्सलाम जिन पर प्रकाशना होती थी, की रहनुमाई और व्याख्या के बगैर खुदा के कलाम को कैसे समझा जा सकता है। इसीलिए इस बात में कोई शक नहीं कि जो लोग हदीस को नहीं मानते, असल में वे कुरआन के भी इन्कार करने वाले हैं।मिशकात के विस्तृत अध्ययन के बाद मुझे इस हकीकत में कुछ भी शक न रहा कि कुरआन अल्लाह का उतारा हुआ है। इस बात ने इस चीज को मजबूती दी कि कुरआन अल्लाहतआला का कलाम है और यह हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की दिमागी मेहनतों का नतीजा नहीं। यह एक हकीकत है कि कुरआन जिन्दगी के बारे में तमाम बुनियादी सवालात का ऐसा ठोस और संतुष्ट करने वाला जवाब देता है जिसकी मिसाल कहीं और नहीं मिलती। मेरे पिता ने एक बार मुझे बताया कि दुनिया में कोई पद हमेशा रहने वाला नहीं है, इसलिए हमें बदलते हुए हालात के साथ खुद को बदल लेना चाहिए, तो मेरे दिल नेउसे कबूल करने से इन्कार कर दिया और मेरी यह प्यास बढ़ती ही चली गयी कि मुझे वह चीज मिले जो हमेशा बाकी रहने वाली हो। खुदा का शुक्र है कि जब मैंने कुरआन पाक को पढ़ा तो मेरी प्यास बुझ गयी और मुझे मेरी पसन्द की चीज मिल गयी। मुझे पता चल गया कि अल्लाह की खुशी के लिए जो भी नेक काम किया जाए वह·भी बेकार नहीं जाएगा और दुनिया में उसका कोई बदला न मिले, तो आखिरत में उसका पुरस्कार जरूर मिलेगा। इसके मुकाबिले में कुरआन ने बताया कि जो लोग किसी अखलाकी कानून के बगैर जिन्दगी गुजारते हैं और खुदा की खुशी को सामने नहीं रखते, दुनियावी जिन्दगी में चाहे वे कितने ही कामयाब हों मगर आखिरत में बहुत ही घाटे में रहेंगे।इस्लाम की शिक्षा यह हैकि हमें हर वह बेकार और बेफायदा काम छोड़ देना चाहिए, जो अल्लाह के हकों औरबन्दों के हकों के रास्ते में रुकावट बनाता हो। कुरआन की इन शिक्षाओं को मेरे सामने हदीस और रसूलेपाक सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पवित्र जीवन ने और ज्यादा स्पष्ट और रोशन किया जैसा कि हजरत आइशा सिद्दीका (रजि.) ने एक बार फरमाया ''आप (सल्ल.) के अखलाक कुरआन के बिल्कुल मुताबिक थे। और वे कुरआनी शिक्षाओं का पूरे तौर से नमूना थे। मैंने देखा कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पवित्र जीवनका एक-एक पहलू मिसाली है। एक बच्चे की हैसियत से, एक बाप की हैसियत से, एक पड़ोसी, एक व्यापारी, एक प्रचारक, एक दोस्त, एक सिपाही और एक फौजी जनरल के एतबार से, एक विजेता, एक विधि-निर्माता, एक शासक और सबसे बढ़कर अल्लाह के एक सच्चे आशिक के लिहाज से वह खुदा की किताब कुरआन की हूबहू मिसाल थे। फिर नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की दिनभर की मशगूलियात के बारे में जानकर मैं बहुत प्रभावित हुई। आप दिन का एक लम्हा भी बेकार न करते और आपका सारा समय अल्लाह और उसकी मानवजाति के लिए समर्पित था। उनका अपनी बीवियों से सुलूक निहायत न्याय वाला और मिसली था। इन्साफ, न्याय और तकवा (अल्लाह से डरने) का यह हाल था कि उनकी प्यारी बेटी हजरत फातिमा (रजि.) ने जायज जरूरत के तहत एक गुलाम के लिए निवेदन किया तो उन्हें तकवा अपनाने को कहा और अपने घरवालों पर दूसरे मुसलमानों की जरूरतों को प्रधानता दी। इस्लाम के पैगम्बर (सल्ल.) ने जिन्दगी का मकसद ऐशपसंदी नहीं बल्कि 'कामयाबी' करार दिया। आपकी शिक्षा के अनुसार जो शख्स आखिरत की कामयाबी के लिए संकल्प के साथ अल्लाह तआला की बन्दगी करता है, उसे जज्बाती सुकून के नतीजे में खुशी और प्रसन्नता खुद बखुद हासिल हो जाती है। इसका यह मतलब नहीं कि आप(सल्ल.) दुनियावी जिन्दगी से बिल्कुल अलग थे। आप रोजाना की जिन्दगी की जरूरियात का खास लिहाज करते थे, खुश मिजाज और खुश बयान थे, बच्चों के साथ खेल भी लेते थे, मगर असल तवज्जो के काबिल उन्होंने आखिरत ही की जिन्दगी को समझा और प्राकृतिक व रूहानी जिन्दगी में काफी संतुलन पैदा कर लिया।अब मैंने फैसला कर लिया कि इस्लाम के प्रभाव अपनी जिन्दगी पर गालिब करूंगी। शुरू में मैंने अपने तौर पर न्यूयार्क के इस्लामी मर्कज में मुसलमानोंसे मुलाकात की राहें पैदा कर लीं और बड़ी खुशी हुई कि जिन लोगों से मेरा संबंध हुआ है, वे अच्छे लोग थे। इस्लामी मर्कज की मस्जिद में मैंने मुसलमानोंको नमाज पढ़ते हुए देखा और इस बात ने मेरे इस यकीन को मजबूत कर दिया कि सिर्फ इस्लाम ही पूरे तौर से आसमानी धर्म है, बाकी धर्मो में सिर्फ नाम की सच्चाई मौजूद है। अब मैं इस फैसले पर पहुंच गयी थी कि इस्लाम ही सच्चा धर्म है और इस्लाम ही में मौजूदा जमाने की बुराइयों का मुकाबला करने और उन पर विजयी होने की क्षमता मौजूद है। अतएव मैंने इस्लाम का अध्ययन करने के बाद इसे कबूल कर लिया। इस्लाम कबूल करने से पहले मेरा मौलाना अबुल आला मौदूदी से काफी पत्राचार हुआ। इस्लाम कबूल करने के बाद मेरी मंजिल कराची थी, जहां मैं मौलाना मौदूदी की दावत पर गयी। जब मैं कराची पहुंची तो वहां मौलाना मौदूदी के चाहने वालों ने मुझे हाथों हाथ लिया और बेहद सेवा और आवभगत की। कुछ दिन बाद मैं जहाज के द्वारा लाहौर आ गयी और मौलाना के घर ठहरी। मैं मौलाना की बच्चियों की उम्र की थी इसलिएमुझे इस घर में कोई अजनबीपन का एहसास न हुआ। कुछ दिनों के बाद मेरा निकाह जमाअत इस्लामी पाकिस्तानके एक मुख़लिस सदस्य मुहम्मद यूसुफ खां से हो गया।मैंने इस रिश्ते को खुशी के साथ कबूल कर लिया और यहफैसला कर लिया कि अज्ञानता की तमाम रस्मों का इन्कार और नबी (सल्ल.) के तरीके की पैरवी करना मेरीजिन्दगी का मकसद है। अल्लाह का शुक्र है कि मैं अपने नये घर में खुशी व सुकून के साथ जिन्दगी गुजार रही हूं।
इंग्लैंड की होनहार महिला पुलिस अफसर ने अपनाया इस्लाम
अट्ठाइस वर्षीय पुलिस अधिकारी जेने केम्प ने घरेलू हिंसा से पीडि़त एक मुस्लिम महिला की मदद केदौरान इस्लामिक आस्था और विश्वास के बारे में जानने का निश्चय किया। उन्होंने इस्लाम का अध्ययन किया और फिर इस्लाम अपनाकर मुसलमान बन गईं।दो बच्चों की मां जेने केम्प ने बताया कि पुलिस अधिकारी के रूप में घरेलू हिंसा से पीडि़त एक मुस्लिम महिला की मदद के दौरान उसने इस्लाम को जाना और फिर इस्लाम से प्रभावित होकर इस्लाम कुबूल कर लिया।इस्लाम के अध्ययन के दौरान केम्प ट्विटर पर कई मुस्लिमों के सम्पर्क में आईं, उनसे कई बातें जानीं और इस सबके बाद उन्होंने अपना कैथोलिक धर्म छोड़कर एक साल पहले इस्लाम धर्म अपना लिया और अब वे पूरी तरह इस्लाम के मुताबिक अपनी जिंदगी गुजार रही हैं। वे एक जिम्मेदार पुलिस अधिकारी के रूप में गश्त पर निकलती हैं लेकिन वे पूरी तरह इस्लामीहिजाब में होती हैं और अपनी ड्यूटी के समय को एडजेस्ट करके वे नमाज पढऩा नहीं भूलती हैं।सात वर्षीय बेटी और नौ वर्षीय बेटे की सिंगल मदर जेने ने पिछले साल आधिकारिक रूप से इस्लाम अपना लिया और अपना नाम जेने केम्प से अमीना रख लिया। वे अपना खाना खुद बनाती हैं ताकि वह पूरी तरह हलाल खाना हो।जेने दक्षिण मेनचेस्टर में रहती हैं। वे कहती हैं, जहां मैं रहती हूं वहां एक बड़ी मस्जिद है और काफी तादाद में मुस्लिम रहते हैं। इस्लाम के प्रति दिलचस्पी के दौरान मैंने तय किया कि मुझे इन लोगोंऔर इनके मजहब के बारे में ज्यादा से ज्यादा अध्ययनकरना चाहिए।जेने कहती हैं- 'पहले मैं सोचती थी कि इस्लाम तो महिलाओं को चूल्हा-चौका करने और घर में कैद रहने के लिए मजबूर करता होगा लेकिन मैंने इसमें ऐसा नहीं पाया बल्कि ये तो अपने समय से ही दूसरों के प्रति उदार और सम्मानपूर्ण व्यवहार की सीख देता है। मैंने पाया कि इस्लाम अपने पड़ोसियों का खयालरखने और उनके साथ अच्छे ताल्लुकात रखने को तरजीह देता है, वहीं बच्चों को माता-पिता को पूरा सम्मान देने और उन्हें उफ् तक न कहने की हिदायत देता है। मैंने आज के अन्य धर्मों को इस्लाम जैसा नहीं पाया। इस्लाम में मुझे अपने हर एक सवाल का जवाब मिला। दरअसल अब तो मुझे इस्लाम से बेहद लगाव हो गया।'जेने बताती हैं, 'जब मैंने अपने सहकर्मियों को बताया कि मैंने इस्लाम अपना लिया और अब मैं कार्यस्थल पर हिजाब पहनना शुरू करना चाहती हूं तो मेरे सहकर्मियों ने मेरा सहयोग किया। पहले मैं चिंतित थी कि मेरे सहकर्मी मेरे इस फैसले पर न जाने क्या सोचेंगे और किस तरह की प्रतिक्रिया व्यक्त करेंगे लेकिन उन्होंने मेरे फैसले का सम्मान किया।'जेने कहती हैं- 'मेरे दोनों बच्चे मेरे पर्दा करने और इस्लाम के बारे में बहुत से सवाल करते हैं लेकिन मैं उन पर जबरदस्ती इस्लाम नहीं थोपूंगी। मैं लोगों को बता रही हूं कि एक मुस्लिम महिला भी पुलिस फोर्स में काम कर सकती है और मुझे उम्मीद है कि इस तरह मैं इस्लाम की नकारात्मक छवि को बदलने की कोशिश करूं गी।'मेनचैस्टर के दक्षिण स्थित जिले विथेनशेवे में पली-बढ़ी जेने बताती हैं,' मेरे इस्लाम अपनाने के फैसले का मेरे घर वालों ने मौटे तौर पर स्वागत ही किया। मेरे इस फैसले से मुझे खुश देखकर वे खुश हैं। एक दिन मेरी बहन ने मुझे इस रूप में देखकर उसने भी खुशी व्यक्त की।'वे कहती हैं, 'मैंने खुले दिलो-दिमाग के साथ इस्लाम का अध्ययन किया।'जैने को इस्लाम की राह दिखाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की मुहम्मद मंजूर ने जो स्थानीय मस्जिद से मुस्लिम ट्विट्र अकांउट चलाते हैं।मुहम्मद मंजूर कहते हैं, 'मैं जेने का अहसानमंद हूंकि उसने मुझे इस्लाम से जुड़े ऐसे सवाल पूछे जिसकीवजह से मैंने इस्लाम का और अधिक अध्ययन किया और मेरी इस्लामिक नॉलेज में बढ़ोतरी हुई। जैने ने अपने स्तर पर अध्ययन करके सच्चाई रूपी इस्लाम को तलाशा। इससे यह भी जाहिर होता है कि मुस्लिम इंग्लैंड जैसे समाज में भी बिना अपने मजहब के उसूलों से समझौता किए घुलमिलकर रह सकते हैं।'बशुक्रिया इस्लामिक वेब दुनिया
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