प्रेम के सबसे बड़े प्रतीक ताजमहल को बनवाने वाले शाहजहां की बेगम मुमताज की मौत बेहद दर्दनाक थी। लगभग 30 घंटे तक 14वें बच्चे की प्रसव पीड़ा से जूझने के बाद 17 जून 1631 की सुबह उसने तड़पते हुए प्राण त्यागे थे। शाहजहां, मुमताज से बेहद प्यार करता था। 16 जून, 1631 की रात मुमताज को प्रसव पीड़ा बढ़ गई। मुमताज प्रसव पीड़ा से तड़प रही थी, उस वक्त शाहजहां डेक्कन के विद्रोह को खत्म करने के बाद कीरणनीति बना रहा था। उसे मुमताज की खराब हालत की सूचना मिली। इस दौरान वह मुमताज के पास नहीं गया। उसने दाइयों को भेजने के निर्देश दिए। 30 घंटे की लंबी जद्दोजहद के बाद मुमताज के आधी रात को एक बेटी गौहर आरा पैदा हुई। लेकिन मुमताज बेहाल थी। शाहजहां को अपने कमरे से कई संदेशवाहक भेजे, लेकिन कोई लौटकर नहीं आया। रात काफी हो चुकी थी। आधी रात से प्यादा का वक्त हो चुका था। शाहजहां ने खुद हरम में जाने का फैसला किया, तभी उसके पास संदेश आया, “बेगम ठीक हैं, लेकिन काफी थकी हुई हैं। बच्ची को जन्म देने के बाद मुमताज गहरी नींद में चली गई हैं। उन्हें परेशान न किया जाए। शाहजहां इसके बाद सोने के लिए अपने कमरे के अंदर चला गया। वह सोने हीवाला था तभी उसकी बेटी जहां आरा वहां पहुंची।द हुक न्यूज़ के अनुसार इसी दौरान तड़प रही मुमताज ने अपनी बेटी जहाँ आरा को पिता शाहजहां के पास बुलाने को भेजा। जब शाहजहां हरम पहुंचा, तो वहां उसने मुमताज को हकीमों से घिरा हुआ पाया। मुमताज छटपटा रही थी। वह मौत के करीब थी। मुमताज ने आखिरी वक्त पर शाहजहां से 2 वादे लिए। पहला वादा शादी न करने को लेकर था। जबकि दूसरा वादा एक ऐसा मकबरा बनवाने का था जो अनोखा हो।मुमताज की देखभाल करने वाली सती उन निसा ने उसके मृत शरीर को रूई के 5 कपड़ों में लपेट दिया। इस्लामिक हिदायतों के वावजूद उसकी मौत पर महिलाएंबुरी तरह रो-रोकर शोक जताती रहीं। मुमताज की मोत से बादशाह ही नहीं पूरा बुरहानपुर गमगीन हो गया था। किले की दीवारें औरतों के रोने की आवाज के भरभरा उठी। मुमताज के शव को ताप्ती नदी के किनारे जैनाबाग में जमानती तौर (अस्थाई) पर दफन कर दिया गया। मौत के 12 साल बाद शव को आगरा के निर्माणाधीनताजमहल में दफन किया गया।

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