मुंबई.शिवसेना भी एमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी के समर्थन में उतर गई है. आपको बता दें कि ओवैसी ने सवाल उठाया था कि राजीव गांधी और बेअंत सिंह के हत्यारों और दूसरे आतंकियों को फांसी पर क्यों नहीं लटकाया जाता ?अब शिव सेना के मुखपत्र सामना में लिखा गया गया है कि किसी भी जाति या धर्म से ताल्लुक रखने वाले आतंकियों को फांसी की सजा दी जानी चाहिए. पार्टी ने राजीव गांधी और बेअंत सिंह के हत्यारों को फांसी दिए जाने की मांग का समर्थन किया.हालांकि, मुंबई ब्लास्ट के दोषी याकूब मेमन की फांसी पर राजनीतिक बयानबाजी के लिए शिवसेना ने ओवैसी की आलोचना की. साथ ही, शिवसेना ने दाऊद इब्राहिम और टाइगर मेमन को भी फांसी देने की मांग की. सामना में लिखा गया है, ‘दाऊद और टाइगर मेमन जैसे लोग जब यमलोक जाएंगे, तभी उन आत्माओं को पूर्ण शांति की प्राप्ति होगी और उन्हें मोक्ष मिलेगा.’जब ओवैसी ने न्यूज़ चैनल के ऑफिस में पत्रकार को लगायी डांटगौरतलब है कि गुरुवार सुबह नागपुर जेल में याकूब मेमन को फांसी दी गई थी. फांसी पर शिवसेना ने कहा कि याकूबकी जगह पर यदि कोई हिंदू, ईसाई या पादरी होता तो उसे भी फांसी पर लटकायाजाना चाहिए था.
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Wednesday, 10 August 2016
इक पंडित ने लिख डाली अपने खून से कुरआन शरीफ।
हरियाणा के रोहतक जिले के निंदाना गांव के रहने वाले पंडित कर्मवीर कौशिक ने अपने खून से कुरान और गीता लिखी हैं. लगभग 7 साल में 369 पन्नोंमें कुरान और लगभग तीन साल में 186 पन्नों की श्रीमद्भगवत गीता लिख कर देश को एकता का सन्देश दिया हैं.कर्मवीर ने बताया कि उन्होंने एक मोरपंख से दोनों ग्रंथ को लिखा है. सुई चुभाकर अंगुली से खून निकालकर पीपल के पत्ते पर खून एकत्रित करके मोरपंख से कागज पर लिखकर दोनों ग्रंथ को पूरे किए. उन्होंने 30 दिसंबर 2015 को अपने जन्मदिन पर कुरान-ए-शरीफ को पूरा किया.पंडित कर्मवीर बताते हैं कि बीते वर्ष हरिद्वार में उन्हें एक अंग्रेजने उनकी पांडुलिपियों के लिए 5 करोड़ रुपए देने का ऑफर किया था, मगर वह किसीभी कीमत पर ऐसा नहीं कर सकते.उनका कहना है कि वे पैसे के लिए यह काम नहीं कर रहे हैं। समाज और धार्मिकसद्भावना के लिए उनका यह प्रयास है. हालांकि कर्मवीर आर्थिक रुप से बहुत कमजोर है, लेकिन इसके बाद भी उन्होंनेयह पांडुलिपि नहीं बेची.
मुस्लिम उल्माओ ने भागवत से पूछा,किस तरह कहते हो मुसलमानो से देशभक्ति।
लखनऊ।आरएसएससेमुस्लिमसमुदाय की दूरी को मिटाने के लिए आज ऑल इंडिया सुन्नी उलेमा काउंसिल के सदस्यों ने संघ प्रमुखमोहन भागवतसे मुलाकात करने पहुंचे। इस मुलाकात के जरिए उलेमा काउंसिल ने संघ सेछह सवाल पूछे हैं। छह सवालों के उलेमाओं के पत्र को संघ प्रमुख ने स्वीकार कर लिया है।यूपी चुनाव से पहले फिर छिड़ा भगवा रागआरएसएस की प्रांत बैठक में हिस्सा लेने के लिए पहुंचे उलेमा मोहन भागवत से तो नहीं मिल सके लेकिन उनके पत्र को स्वीकारकर लिया गया है। उलेमा काउंसिल ने संघ प्रमुख से जो अहम सवाल पूछे हैं उनमें से एक है कि क्या आरएसएस भारत को हिंदू राष्ट्र मानता है। अगर मानता है तो क्या वह हिंदू धर्म ग्रंथों के हिसाब से देश को चलायेगा।तीसरा जो सवाल उलेमा काउंसिल ने पूछा है वह है धर्म परिवर्तन पर संघ की क्या नीति है। इसके अलावा एक दिलचस्प सवाल यह पूछा है कि मुसलमानों से संघ किस प्रकार का राष्ट्र प्रेम चाहता है। इसके अलावा छठा और आखिरी सवाल उलेमा काउंसिल ने पूछा है कि संघ इस्लाम के बारे में क्या जानता है।गौरतलब है कि हाजी मोहम्मद सलिस ने करीब छह महीने पहले भी आरएसएस की अल्पसंख्यक विगं के मार्गदर्शक इंद्रेश कुमार से ये सवाल पूछे थे लेकिन उनका जवाब नहीं मिला था। ऐसे में देखने वाली बात है कि आरएसएस की प्रांत बैठक में सलिस को इन सवालों का जवाब मिलता है या नहीं।
गर्मी से परेशान युवक ने सूर्य भगवान पर किया केस
गर्मी और तपन से कोई किस हद तक परेशान हो सकता है इस बात का अंदाजा नीचे वाली तस्वीर को देखकर लगायाजा सकता है। ये एक पत्र है जिसमें भगवान सूर्य के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई गई है। इसमें सूरज की तपनसे पीड़ित व्यक्ति ने अपनी व्यथा लिखित रूप में प्रकट की है।शिवपालसिंह नाम के इस शख्स ने मध्यप्रदेश के शाजापुर थाने में अपनी शिकायत दर्ज कराते हुए रिपोर्ट में लिखा है कि मैं विगत एक सप्ताह से आसमान से बरसती आग के कारण मानसिक एवं शारीरिक रूपसे कष्ट सह रहा हूं। इसके जिम्मेदार श्रीमान सूर्नारायण निवासी ब्रह्मांड पर भारतीय संविधान अनुसार आवश्यक कानूनी धाराओं में कार्यवाही कर मुझे एवं जनमानस को राहत प्रदान करने का कष्ट करें।शिवपालसिंह ने आगे लिखा है कि विगत एक सप्ताह से श्रीमान सूर्यनारायण अपनी हदें तोड़कर प्रत्येक जीव का जीना दुश्वार कर रहे हैं। मुकबधीर पशु, पक्षी की दयनीय एवं पेड़-पौधों की जल जाने जैसी हालत साक्ष्य के रूप में आपके सामने है। प्रार्थी के आवेदन पर सद्भावना पूर्वक विचार कर दंड प्रकिया संहिता 1973 की धारा 154 के अंतर्गत रिपोर्ट दर्ज करने का कष्ट करें।यह रिपोर्ट 20 मई का है जिसमें शाजापुर पुलिस कोतवाली का स्टैंप लगा हुआ है।
ये था दुनिया का सबसे बदनाम गाना, 62 साल रहा बैन
गानों को लेकर आपका क्या कहना है। जाहिर है कुछ अच्छा ही होगा। गाने दिल के करीब होते ही हैं। क्या आप जानते हैं कुछ गाने ऐसे भी हैं जिसको सुनने के बाद कईयों ने आत्महत्या कर ली।हम बात कर रहे हैं Sad Sunday गाने की जिसे 1933में हंगरी के संगीतकार Rezso Seress ने बनाया था। ये दुनिया के सबसे ज्यादा पॉपुलर और मनहूस गानों में गिना जाता है।इस गाने के बोल दिल को छू लेते हैं। ये गाना एक रोमांटिक साउंड ट्रैक है। इस गाने में प्रेमी मर जाता है पर प्रेमिका बाद में भी उससे मिलने की ख्वाहिश करती है। ये गाना अपने अंदर इतने दर्द को समेटे हुए है कि हर सुनने वाले को अपना दर्द महसूसहोने लगता है।फेमस होने के नाते 1941 में अमेरिकन जैज म्यूजिक के जादूगर माने जाने वाले Billie Holiday ने इस गाने का रीमेक बनाया। फिर भी इस गाने का नशा बरकरार रहा। लोगों के आत्महत्या करने में कोई कमी आई।यह गाना इतना बदनाम हो चुका था कि 1941 में BBC सहित कई देशों ने इस गाने पर प्रतिबंध लगा दिया और 63 वर्षों बाद 2003 में इससे बैन हटाया गया।ये थी इस गाने की कहानी जो इस दौर से गुजर चुके लोगों को अपनी सी लगती थी।
मुस्लिम महिला ने हिजाब के लिए ठुकराई नौकरी
अमूमन देखा जाता है कि नौकरी पाने के लिए लोग मालिक की ‘हा’ में ‘हा’ मिला लेते है, लेकिन न्यूज़ीलैंड के ऑकलैंड में रहने वाली इस महिला को सलाम जिसने हिजाब बंधने के लिए नौकरी छोड़ दी। ऑकलैंड में रहने वाली मोना अल्फादली ने शहर की एक जेवरात की दुकान पर नौकरी के लिए दरख्वास्त की थी लेकिन दूकान मालिक ने नौकरी पाने के लियें उनको हिजाब ना पहनने की शर्त रख दी जिसक बाद मोना ने नौकरी ही ठुकरा दी नौकरी न मिलने पर उन्होंने कहा कि उनको बहुत बुरा लग रहा है।
13 साल की उम्र में हुआ था रेप, अलीसिया कीकहानी, उन्हीं की ज़ुबानी
अलीसिया कोज़ीकिएविच सिर्फ़ 13 साल की थीं, जब वे पिट्सबर्ग के अपने घर से बाहर निकलीं, उस शख़्स से मिलने जिससे वे ऑनलाइन चैट किया करती थीं. उसके बाद जो कुछ हुआ, वह किसी बुरे सपने से कम नहीं था.आज वे 27 साल की हैं और अपनी कहानी बता रही हैं ताकि दूसरों के साथ वैसा न हो. अलीसिया की कहानी, उन्हीं की ज़ुबानी -यह 2002 का नया साल था. मेरी मां ने पोर्क और सॉरक्रॉत का बेहद स्वादिष्ट खाना बनाया था. मेरी दादी, मां, पिता, भाई और उसकी गर्लफ्रेंड, हम सबने मिलकर खाना खाया. उसके बाद मैं बाहर निकल गई थी. मुझे अच्छी तरह याद है कि मैं सड़क पर थी, चारों तरफ़ बर्फ़ ही बर्फ़ थी. बिल्कुल सन्नाटा छाया था. मैंने अपने आप से कहा, मैं यह क्या कर रही हूँ.किसी ने मेरा नाम लेकर मुझे बुलाया. थोड़ी देर बाद मैं एक कार में बैठी थी. मेरा एक स्क्रीन नाम था और मैं अपने दोस्तों से हर तरह की बातें किया करती थी.उन्हीं में एक लड़का था, जो मेरी ही उम्र का लगता था. वो मुझसे काफ़ी बातें किया करता था. मेरी बातेंसुनता था, मुझे सलाह दिया करता था.यही वह लड़का था, जिसे मिलने मैं गई थी और जिसकी गाड़ी में बैठ गई थी. लेकिन उसने मेरा हाथ काफ़ी मज़बूती से पकड़ रखा था और गाड़ी चला रहा था. वह मुझसे बीच-बीच में कहता जा रहा था, “शांत हो जाओ, चुपचाप बैठो. मेरा कहा नहीं माना तो तुम्हें उठाकरगाड़ी की डिक्की में डाल दूंगा.”वह मुझे एक मकान के तहखाने में ले गया. उसने कुत्तेको बांधने वाला कॉलर मेरे गले में डाल दिया और बिस्तर पर ले गया. उसने मेरे साथ बलात्कार किया. उसने मुझे बिस्तर के साथ बांध दिया, मुझे बुरी तरह पीटा. मुझे तरह-तरह की यातनाएं दी और मेरे साथ बलात्कार करता रहा. मेरे साथ ऐसा चार दिन तक होता रहा. मैंने अपने आप से कहा, “शायद वह मेरी हत्या कर दे. पर मैं संघर्ष किए बग़ैर हार नहीं मानूँगी. पर मुझे लगा कि पूरी तरह टूट चुकी थी.”ऐसे में मुझे अपने माता-पिता की बहुत याद आई. मैं जानती थी कि वे मुझे ढूंढ रहे होंगे. वे मुझे यहां से निकालने के लिए हर मुमकिन कोशिश कर रहे होंगे. पर सवाल यह था कि वे मुझे ज़िंदा पाएंगे या नहीं. आज भी लोग मेरी कहानी सुनते हैं तो उन्हें काफ़ी झटका लगता है. जिस समय मेरा अपहरण हुआ, लोगों के लिए यह समझना नामुमकिन था कि मेरे साथ यह आख़िर कैसे हो गया. वे लोग तो पीड़ित पर ही दोष डाल देते हैं.मैं और मेरे परिवार के लोगों ने यह तय कर लिया कि मैं दूसरे बच्चों और उनके रिश्तेदारों को इससे बचाऊँगी. हमने यह महसूस किया कि इस तरह की घटना की मुख्य वजह यह है कि उन दिनों इंटरनेट सुरक्षा से जुड़ी शिक्षा बच्चों को नहीं दी जाती थी.मैं 14 साल की उम्र से ही सबको बताने लगी कि मेरे साथ क्या हुआ था. मैं प्रेज़ेंटेशन देती थी, अपनी कहानी लोगों को सुनाती थी. मेरा यह मिशन आज भी चल रहा है. सख़्त क़ानून न होने से दो प्रतिशत से भी कम मामलों में बच्चों के यौन शोषण की सही-सही जांच हो पाती है. नया क़ानून बनाया गया ताकि इंटरनेट के ज़रिए बच्चों के साथ होने वाले अपराध को रोकने के लिए टास्क फ़ोर्स बनाया जा सके.इस क़ानून को मेरे नाम पर ही अलीसिया लॉ कहा गया. इस नियम के तहत यौन शोषण से बच्चों को बचाने के लिएस्थायी तौर पर व्यवस्था करने का प्रावधान है. अमरीकी राज्य वर्जीनिया, कैलीफ़ोर्निया, केंटकी, टेक्सस, टेनेसी, एरिज़ोना, हवाई और वॉशिंगटन में अलीसिया क़ानून पारित हो चुका है. हम इस कोशिश में हैं कि इसे विस्कॉन्सिन, मेरीलैंड और दक्षिण कैरोलाइना में भी जल्द ही पारित कर दिया जाए.मैं फ़ोरेंसिक साइकोलॉजी में मास्टर्स डिग्री कर रही हूँ. मैंने तय कर लिया है कि उन बच्चों के लिए काम करूंगी, जिनका यौन शोषण हुआ है. मेरे मंगेतर इसमें मेरी भरपूर मदद कर रहे हैं. वे एक नेकदिल इन्सान तो हैं ही, मेरे बहुत अच्छे दोस्त भी हैं. मैं यह मानती हूँ कि बलात्कार पूरी तरह ताक़त और नियंत्रण का मामला है. ऐसा प्रेम में नहीं होता. बीबीसी रिपोर्ट
नोरा जेसमीन – मुझे दुख है कि हिजाब पहनने में देरी क्यों कर दी ?
मैं अपने पति के साथ पहली बार मस्जिद गई। मैं नर्वस थी क्योंकि मैं नहीं जानती थी कि मस्जिद मेंकिन बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए और मस्जिद में किस तरह के दिशा-निर्देशों का पालन जरूरी है। पति के कुछ बातें समझाने के बावजूद मैं असहज थी। अल्लाह का शुक्र है कि मैंने वहां मगरिब की नमाज अदा की और वहां मैंने सुकून महसूस किया। फिर मैं अगले कुछ हफ्ते और मस्जिद गई तो मुझे महसूस हुआ कि मस्जिद में आने वाली अन्य औरतों की तरह मुझे भी यहां हिजाब पहनकर आना चाहिए। मुझे दिल में इस बात का मलाल हुआ कि आखिर मैंने पर्दा करने में साल भर की देरी क्यों कर दी। मेरे पति मेरे बहुत मददगार थे और उन्होंने मुझे इजाजत दे रखी थी कि इस्लाम के मामले में मुझे दिली इत्मीनान हो जाने पर ही मैं इन सब पर अमल करूं।इस्लाम अपनाने वाली नोरा जेसमीन की जुबानी………….!मेरा नाम नोरा जेसमीन है। मैं सिंगापुर से हूं और मैंने चीनी कल्चर छोड़कर इस्लाम अपनाया है। अपने कुछ करीबी दोस्त, मेरे पति, उनका परिवार, मेरा परिवार खासतौर पर मेरी मां की मदद से मैंने 11 मई 2013 को इस्लाम अपनाया। मेरी मां ने इस बात को माना कि मुझे भी इस्लाम अपना लेना चाहिए हालांकि वह खुद कठिन समय का सामना कर रही थी।मैं अपनी मां की बेहद अहसानमंद हूं कि उसने मेरी जिंदगी के इस अहम बदलाव की घड़ी में मेरा साथ दिया। अल्लाह का लाख-लाख शुक्रं है कि उसने इस्लामकी तरफ आने के मेरे सफर को आसान बनाया।जब से मुसलमान हुई तब से आज तक हिजाब न पहनने की बात मेरे दिमाग में कभी नहीं आई। हालांकि कुछ कारणों जैसे – “कुछ वक्त इंतजार करो जब तक हमारे बच्चे नहीं हो जाते” या “मैं अभी इसके लिए तैयार नहीं हूं।” के चलते इस्लाम अपनाने के साल भर बाद तकमैंने हिजाब नहीं पहना।हालांकि बहु-नस्लीय मुल्क सिंगापुर में रहने के कारण मेरे दिमाग में डर भी था कि मेरे इर्द-गिर्द वाले लोग मेरे पर्दे करने को स्वीकार नहीं कर पाएंगे। जब कभी मैं पर्दा करने की सोचती तो निराश हो जाती और मेरे दिल की धड़कन बढऩे लगती।एक दिन एक अप्रेल 2014 को मैं अपने पति के साथ पहली बार मस्जिद गई। मैं नर्वस थी क्योंकि मैं नहीं जानती थी कि मस्जिद में किन बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए और मस्जिद में किस तरह के दिशा-निर्देशों का पालन जरूरी है।पति के कुछ बातें समझाने के बावजूद मैं असहज थी। अल्लाह का शुक्र है कि मैंने वहां मगरिब की नमाज अदा की और वहां मैंने सुकून महसूस किया। फिर मैं अगले कुछ हफ्ते और मस्जिद गई तो मुझे महसूस हुआ कि मस्जिद में आने वाली अन्य औरतों की तरह मुझे भी यहां हिजाब पहनकर आना चाहिए। मुझे दिल में इस बात का मलाल हुआ कि आखिर मैंने पर्दा करने में साल भर की देरी क्यों कर दी। मेरे पति मेरे बहुत मददगार थे और उन्होंने मुझे इजाजत दे रखी थी कि इस्लाम के मामले में मुझे दिली इत्मीनान हो जाने पर ही मैं इन सब पर अमल करूं।एक दिन मैंने वल्र्ड हिजाब डे फेसबुक पेज पर “30 दिनों के लिए हिजाब की चुनौती” कैम्पेन में हिस्सा लेने का इरादा किया और सोचा कि रमजान महीनेके दौरान इस कैम्पेन में हिस्सा लेकर हिजाब पहनना दिलचस्प और उत्साहवद्र्धक रहेगा।मैंने अपनी मां, पति और अपने दोस्तों को बताया कि मैं अब हिजाब पहनना शुरू कर रही हूं। अल्लाह का शुक्र है कि पहले रोजे को पूरे दिन मैंने हिजाब पहने रखा। अल्लाह का बेहद अहसान है कि वह मुझे फिर से अपने करीब लाया।मैं पर्दे में खुद को पहले की तुलना में अधिक सुरक्षित महसूस करती हूं और पर्दे में मेरी ज्यादा इज्जत की जाती है। मुझे मुस्लिम होने पर गर्व है।मेरे पति को बेहद आश्चर्य हुआ कि इस्लाम अपनानेके एक साल बाद ही मैंने पर्दा करना शुरू कर दिया। मुझे बेहद खुशी है कि मैंने अपनी इच्छा से इस्लाम का रास्ता अपनाया उस अल्लाह के लिए, उस एक पालनहार के लिए।मैं अपनी बहनों से कहना चाहूंगी कि अगर आप भी मेरे शुरू के एक साल की तरह दुविधा में है तो अल्लाह से मदद मांगे, दुआ करें, अल्लाह आपका रास्ताआसान फरमाएगा।अल्लाह हमें परेशानी में अकेला कभी नहीं छोड़ता बल्कि हमारी राह आसान करता है।#तक़वा इस्लामिक स्कूल
मुस्लिम औरतें ना पहने ट्राउजर, फेसबुक अकाउंट बंद कर
लंदन।अब ब्रिटेन में भी मुस्लिम औरतों के लिए पाबंदी के नियम लागू हो रहे हैं। जिसमें मुस्लिम महिलाओं को अपने फेसबुक अकाउंट बंद करने, ट्राउजर नहीं पहनने, पति और पिता के इजाजत के बगैर घर से बाहर नहीं निकलना शामिल है।'द टाइम्स' द्वारा किए अध्ययन में मस्जिदों और पूरेब्रिटेन के इस्लामी संघों के आदेशों को बताया गया है। 'द टाइम्स' में 'इस्लामिक आर्टिकल्स' शीर्षक से छपे एक खंड में मस्जिद और लंदन के इस्लामी केंद्र द्वारा प्रकाशित 'पति और पत्नी के लिए परामर्श' नामक दस्तावेजों को शामिल किया गया है।मस्जिद के मुफ्ती द्वारा लिखे प्रलेख में कहा गया है कि मुस्लिम महिलाओं को घर से बाहर निकलते समय अपने पति की परमीशन लेनी चाहिए। वहीं उत्तर पश्चिम इंग्लैंड में ब्लैकबर्न के सेंट्रल मस्जिद ने 'फेसबुक के खतरे' शीर्षक से एक वेब पोस्ट लिखा गया है, जिसमें कुरआन का हवाला देते हुए शराब को हराम बताया गया है। वहीं बर्मिंगम के ग्रीन लेन मस्जिद के अनुसार, मुसलमान महिलाओं को पति के सामने भी ट्राउजर पहनने की इजाजत नहीं है। #प्रतीकात्मक तस्वीर
फ़्रांस : पिछले 8 महीनों के दौरान 20 मस्जिदें की गयी हैं बंद
फ़्रांस में अतिवाद के ख़िलाफ़ कथित संघर्ष के तहत लगभग 20 मस्जिदों और प्रेयर हॉल को बंद कर दिया गया है। फ़्रांस के गृह मंत्री बर्नार्ड कैज़नूव ने इस देश की मुसलमानों की धार्मिक परिषद के नेताओं से मुलाक़ात के बाद सोमवार को बताया कि पिछले 8 महीनों के दौरान इन मस्जिदों को बंद किया गया है। उन्होंने दावा किया कि बंद किए गए इन धार्मिक स्थलों में अतिवादी इस्लाम की शिक्षा दी जाती थी।फ़्रांस के गृह मंत्री बर्नार्ड कैज़नूव ने इस बात का उल्लेख करते हुए, “फ़्रांस में मस्जिदों या प्रेयर हॉल में नफ़रत भड़काने वालों और कुड लोकतंत्र वादी सिद्धांतों का सम्मान न करने वालोंके लिए इस देश में कोई स्थान नहीं है।” कहा, “इसलिए हमने कुछ महीने पहले यह फ़ैसला किया कि आपात स्थिति के ज़रिए मस्जिदों को बंद कर दें। अब तक 20मस्जिदें बंद की जा चुकी है और कुछ दूसरी मस्जिदोंको भी बंद करेंगे।”पिछले हफ़्ते फ़्रांसीसी प्रधान मंत्री मैनुएल वॉल्स ने कहा कि वह उन मस्जिदों को अस्थायी रूप से बंद करने के बारे में सोच रहें जिन्हें विदेशी पैसों की मदद मिलती है।पूरे फ़्रांस और यूरोप में कुछ दूसरे स्थान पर, सऊदी अरब की ओर से पैसों की मदद पाने वाली मस्जिदों को तकफ़ीरियत और वहाबियत के प्रचार का केन्द्र समझा जाता है। तकफ़ीरियत बड़ी सीमा तक वहाबियत से प्रभावित है। इस अतिवादी विचारधारा कासऊदी अरब में बहुत प्रभाव है और सऊदी धर्मगुरु इसीविचारधारा का खुले आम प्रचार करते हैं।
ओवैसी नहीं सपा खिलाफ था मेरा बयान, जो टोपी पहन कर टोपी पहनाते ह
सऊदी अरब के इस्लामिक स्कॉलर हसन मदनी नदवी ने इफ्तार पार्टी की सख्त अल्फाज़ों में कड़ी निंदा की है। उन्होंने कहा कि इसमें केवल राजनीतिक फायदा देखा जाता है। जबकि धर्म का मजाक उड़ाया जाता है। उन्होंने आगे कहा कि वैसे भी इसमें अमीर और दूसरे धर्म के लोग ही आमंत्रित होते हैं और गरीबों को कोई नहीं पूछता। जबकि रोज़ा रखने का असल मकसद तो उनकी ही भावनाओं को समझना है और फिर उनकी मदद करना है। मगर आज राजनीतिक दल अपना उल्लू सीधा कर सीधे-साधे मुस्लिमों को मूर्ख बना रहे हैं।उन्होंने स्पष्ट किया की उनका यह बयान ओवैसी के विरोध मे नही दिया था, बल्कि समाजवाद के नाम पर साम्प्रदायिकता और साम्राज्यवाद फ़ैलाने वालो के विरोध मे दिया था, जो रमजान में टोपी पहन कर आते हेंऔर फ़िर मुसलमानो को टोपी पेहनाते हैं।
महिला के साथ 'नस्लीय दुर्व्यवहार', यूनिवर्सिटी के बाहर हिजाब खींचकर फाड़ा
नई दिल्ली। ब्रिटेन में एक यूनिवर्सिटी की इस्लामिक सोसाइटी की मुस्लिम महिला को नस्लीय दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा। एक 'घिनौने' हमले में कैम्पस की बिल्डिंग के बाहर उसके हिजाब को खींचकर फाड़ दिया गया।पाकिस्तानी अखबार 'एक्सप्रेस ट्रिब्यून' की रिपोर्ट के मुताबिक, इस बारे में एक अन्य छात्र ने फेसबुक पर भी पोस्ट किया है। जिसमें उसने बताया किकिस तरह उसकी दोस्त पर हिजाब पहनने पर किस तरह का व्यवहार का सामना करना पड़ा।बताया जा रहा है कि यह घटना तब हुई जब किंग्स कॉलेजलंदन के कैंपस के बाहर छात्रों के एक समूह ने एक स्टॉल लगाया था। जो 'डिस्कवर इस्लाम वीक' के हिस्सेके तौर पर लगाया गया था। यूनिवर्सिटी की तरफ से जारी बयान में कहा गया है कि दो सिक्योरिटी मैनेजर्स ने हस्तक्षेप किया। लेकिन छात्रों का कहना है कि उन्हें इसके लिए सवाल-जवाब करने और कार्रवाई करने में वक्त लगा।यूनिवर्सिटी की इस्लामिक सोसाइटी के सदस्य हरीम घानी ने बताया कि युवक महिला से पूछते रहे, "तुमने अपने चेहरे पर ये क्यों पहन रखा है।" इस घटना की पुलिस जांच कर रही है। जांच के लिए सीसीटीवी फुटेजभी सबूतों के तौर उपलब्ध कराए जाएंगे।न्यूज़ २४
इस्लाम को आतंक से जोड़ना है गलत,सामाजिक अन्याय की वजह है आतंवाद का कारन।
वासी।ईसाई धर्मगुरु पोप फ्रांसिस ने कहा है कि हिंसा के साथ इस्लाम को जोड़ना गलत है और सामाजिक अन्याय तथा पैसा आतंकवाद का प्रमुख कारण है।फ्रांसिस गत माह 26 जुलाई को फ्रांस के एक चर्च में हुये आतंकी हमले के दौरान बुजुर्ग पादरी की गला काटने वाली घटना के संदर्भ में बोल रहे थे। आतंकवादी संगठन इस्लामिक स्टेट (आईएस) ने इस हमले की जिम्मेदारी ली थी।फ्रांसिस ने कहा,’ मुझे लगता है कि हिंसा के साथ आतंकवाद को पहचानना सही नहीं है। सभी धर्मों में कुछ शरारती समूह होते हैं। मैं इस्लामिक हिंसा के ऊपर बात नहीं करना चाहता क्योंकि रोजाना जब मैं अखबार पढ़ता हूं तो देखता हूं कि इटली में कोई अपनी प्रमेका की हत्या कर रहा है तो कोई अपनी सॉस की हत्या कर रहा है। यदि हम इस्लामिक हिंसा की बात करते हैं तो ईसार्ई हिंसा की भी बात करनी होगी। सभी मुस्लिम हिंसक नहीं होते।’उन्होंने कहा कि आतंकवाद के कई कारण है। धर्मगुरु ने कहा,’ मुझे पता है यह कहना थोड़ा कठिन होगा लेकिन आतंकवाद तभी पनपता है जब उनके पास पैसा कमाने का और कोई विकल्प नहीं बचता। यह आतंकवाद का पहला रूप है और यह सभी मानवता के खिलाफ है। हमें इस पर बात करना होगा।’ उन्होंने कहा कि आर्थिक विकल्पों के अभाव के कारण हमें यह सब देखने को मिलता है।
भारतीय मज़दूरों को राहत की साँस सऊदी किंग ने 178 करोड़ की राशि जारी की।
बेरोजगारी के चलते हजारों की तादाद में सऊदी अरब में फंसे भारतीयों की मदद के लिए खुद सऊदी बादशाह आगे आये हैं. उन्होंने भारतीय मजदूरों के बकाए को लेकर कड़े निर्देश जारी किए हैं. साथ ही न्होंने मदद के लिए दस करोड़ सऊदी रियाल (करीब 178 करोड़ रुपये) की धनराशि भी जारी कर दी हैं. साथ ही संकट में फंसे मजदूरों को एक्जिट वीजा देने का पासपोर्ट विभाग को आदेश दिया है.सुल्तान सलमान ने भारतीय मजदूरों के बकाये लेकर जारी निर्देश में कहा, ‘जब तक प्रवासी मजदूरों का बकाया नहीं दिया जाता, तब तक सरकार के साथ जुड़े कंपनियों को कोई सरकारी भुगतान नहीं होगा.श्रम मंत्रालय को निर्देश दिया गया है कि वह संबंधित देशों के प्रतिनिधियों से संपर्क कर सऊदीसरकार द्वारा उठाए गए कदमों के बारे में बताए. इसके अलावा किंग सलमान ने देश भर में श्रमिक विवादनिपटारा ट्रिब्यूनल की तादाद बढ़ाकर 30 करने की घोषणा भी की है.उनकी घोषणाओं के बाद सऊदी अधिकारियों ने जेद्दा स्थित भारतीय दूतावास से संपर्क कर मजदूरों के लिए वैकल्पिक रोजगार तलाशने का काम तेजी से शुरू कर दिया है।
आख्रिर टीम इंडिया में युवराज सिंह की जगह कौन लेगा?
नई दिल्ली।वर्ल्ड टी 20 में युवराज सिंह की चोट ने टीम इंडिया का सिरदर्द बढ़ा दिया है। गुरूवार के मैच में युवराज के खेलने की उम्मीद न के बराबर है, तो ऐसे में उनकी जगह कौन लेगा इस पर टीम के इंडिया के अंदर जंग शुरू हो गई है।सूत्रों के मुताबिक तीन दावेदार सामने आये हैं जो भारतीय क्रिकेट टीम के तीन दिग्गजों की पसंद हैं। रवि शास्त्री रहाणे को लाना चाहते हैं तो कोहली कीपसंद मनीष पांड़े हैं जबकि धोनी चाह रहे हैं कि स्पिनर पवन नेगी मैच खेलें।युवराज सिंह के ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ आईसीसी विश्व टी 20 मैच में टखना चोटिल करने के बाद वेस्टइंडीज के खिलाफ होने वाले भारत के सेमीफाइनलमुकाबले से पहले फोकस अब अंजिक्य रहाणे पर आ गया है। वहीं मनीष पांडे को कवर के तौर पर टीम से जोड़ागया है। अजिंक्या रहाणे ने अभी तक टूर्नामेंट में कोई भी मैच नहीं खेला है, अगर युवराज सिंह 31 मार्च को होने वाले अंतिम चार के मुकाबले के लिये समय पर उबर नहीं पाते हैं तो अजिंक्या रहाणे को अपने घरेलू मैदान मुंबई में खेलने का मौका मिल सकता है।कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने छह विकेट की जीत के बाद बात करते हुए कहा था कि हालात को देखते हुए अगरप्लेइंग इलेवन में बदलाव की जरूरत होती है तो वह इसके लिए तैयार हैं। टीम प्रबंधन युवराज सिंह की चोट का आकलन कर रहा है। टखना मुड़ने के बाद युवराज दर्द से कराह रहे थे और फिजियो उन्हें देखने मैदानमें गये थे। अगर जरूरत पड़ती है तो अजिंक्या रहाणेको मैच के लिये तैयार रहना होगा और ऑस्ट्रेलिया केखिलाफ मैच से पहले ही उन्होंने आई एस बिंद्रा स्टेडियम में नेट पर ज्यादा समय बिताना शुरू कर दिया था।
ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटर उस्मान खवाजा ने अपनी गर्लफ्रेंड को मुस्लिम बनाकर किया निकाह।
ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटर उस्मान ख्वाजा ने यह उजागर किया कि उन्होंने पिछले दिनों गर्लफ्रेंड रचेल मैक्लेलान के साथ सगाई कर ली। इस 29 वर्षीय क्रिकेटर ने इंस्टाग्राम पर अपना तथा रचेल का पिछले दिनों न्यूयॉर्क में ब्रेक के दौरान का फोटो लगाते हुए सगाई की जानकारी दी। उस्मान ने कैप्शन लिखा - यह जानकारी देते हुए मैं बहुत खुशी महसूस कर रहा हूं।की मेने अपनी गर्लफ्रेंड से मुस्लिम बनकर निकाह करने के लिए शर्ट रखी और उसने तुरंत हा कर दिया क्योंकि वो क़ुरान को पढ़ चुकी थी और इस्लाम के बारे में काफी तहक़ीक़ की हुई थी, तब मेने
रचेल ने सगाई कर ली है। ऑस्ट्रेलियाई टीम यहां श्रीलंका के खिलाफ टेस्ट सीरीज की तैयारी में जुटी हुई है। मैक्लेलान ने कहा, 'वेस्टइंडीज में त्रिकोणीय सीरीज जीतने के बाद न्यूयॉर्क में हमने एक सप्ताह छुट्टियां मनाई। इसी दौरान उस्मान ने मुझे प्रपोज किया और मैंने तुरंत रजामंदी प्रदान कर दी। उस्मान द्वाराप्रपोज किए जाने के कारण न्यूयॉर्क इस बार बहुत खूबसूरत लगा। ख्वाजा और रचेल पिछले काफी समय से डेट कर रहे हैं। पाकिस्तान में जन्मे ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटर ख्वाजा ने इस वर्ष की शुरुआत में अंतरराष्ट्रीय पदार्पण किया था।
रचेल ने सगाई कर ली है। ऑस्ट्रेलियाई टीम यहां श्रीलंका के खिलाफ टेस्ट सीरीज की तैयारी में जुटी हुई है। मैक्लेलान ने कहा, 'वेस्टइंडीज में त्रिकोणीय सीरीज जीतने के बाद न्यूयॉर्क में हमने एक सप्ताह छुट्टियां मनाई। इसी दौरान उस्मान ने मुझे प्रपोज किया और मैंने तुरंत रजामंदी प्रदान कर दी। उस्मान द्वाराप्रपोज किए जाने के कारण न्यूयॉर्क इस बार बहुत खूबसूरत लगा। ख्वाजा और रचेल पिछले काफी समय से डेट कर रहे हैं। पाकिस्तान में जन्मे ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटर ख्वाजा ने इस वर्ष की शुरुआत में अंतरराष्ट्रीय पदार्पण किया था।
इस्लाम:अमेरिकी मुस्लिम इब्तिहाज मोहम्मद ने हिजाब पहनकर की तलवारबाजी
रियो डि जेनेरो।ओलिंपिक के तीसरे दिन कई ध्यान आकर्षित करने वाली घटनाएं हुईं। जहां रफेला सिल्वा मेजबान ब्राजील की पहली गोल्ड मेडल विजेताबनीं, वहीं अमेरिका की तलवारबाज इब्तिहाज मोहम्मद ने हिजाब पहनकर प्रतियोगिता में भाग लेकर इतिहास रचा दिया। वह हिजाब पहनकर हिस्सा लेने वाली अमेरिका की पहली महिला खिलाड़ी हो गई हैं।अमेरिका की अश्वेत मुस्लिम खिलाड़ी इब्तिहाज मोहम्मद ने महिलाओं की तलवारबाजी प्रतियोगिता में स्कार्फ पहनकर हिस्सा लिया और अपने पहले मुकाबले में जीत भी हासिल की. न्यूजर्सी की रहने वाली इस एथलीट ने तलवारबाजी शौक के रूप में शुरू की थी, क्योंकि उन्हें अपने धर्म के हिसाब से अपनी ड्रेस पहननी पड़ती थी, जो उनके लिए मुश्किल था। हालांकि उन्होंने हार नहीं मानी और ओलिंपिक तक का सफर तय कर लिया।सोमवार रात को अमेरिका की लिली किंग ने 100 मीटर ब्रेस्टस्ट्रोक तैराकी में रूस की यूलिया एफिमोवा को पूछे छोड़ते हुए गोल्ड जीता, अमेरिका की पुरुष बास्केटबॉल टीम ने धीमा शुरुआत के बाद मैच में पकड़ बनाई और वेनेजुएला को 113-69 से हरा दिया, वहीं अमेरिकी स्टार टेनिस खिलाड़ी और पिछले ओलिंपिक टेनिस की गोल्ड मेडल विजेता सेरेना विलियम्स फ्रांस की एलीज कॉर्नेट को काफी संघर्ष के बाद 7-6 (5) और 6-2 से हारने में कामयाब हुईं।सोमवार को ही ब्राजील के स्लम एरिया में पली-बढ़ींराफेल सिल्वा ने मेजबान देश के लिए पहला गोल्ड जीता, तो उनकी आंखों में आंसू थे, सिर्फ राफेल क्यों वहां पर मौजूद ब्राज़ील के हर दर्शक की आंखोंमें आंसू थे। यह कोई छोटी जीत नहीं थी, बल्कि इस जीतने कई लोगों को छोटा कर दिया था, जो राफेल को लेकर टिप्पणी कर रहे थे। उनके रंग और समुदाय को लेकर मज़ाक उड़ा रहे थे। महज यह जीत सिर्फ एक गोल्ड मेडल की नहीं है, बल्कि यह ब्राज़ील के उस वंचित समुदाय की जीत है, जो कई सालों से संघर्ष कर रहा है. उन्होंने जूडो के 57 किग्रा वर्ग में गोल्ड हासिलकिया।इसने मेजबान ब्राजील के उस जख्म पर मरहम लगाया, जो उसकी फुटबॉल टीम के ओलिंपिक से शुरुआती दौर में हीबाहर हो जाने के बाद लगा था। हालांकि ब्राजील के फैन्स केवल अपनी फुटबॉल टीम की ही आलोचना नहीं कर रहे हैं, बल्कि वह जीका वायरस के डर से ओलिंपिक में नहीं आने वाले अमेरिकी खिलाड़ियों को लेकर भी उनका मजाक उड़ा रहे हैं।
Mim पार्टी के उत्तर परदेश के चुनाव के लिए रजिस्ट्रशन को मंजूरी मिली:शोएब आज़म
Mim समर्थको के लिए खुशखबरी अभी अभी मिली खबर के मुताबिक हमारे इक योग्य और युथ लीडर मोहम्मद शोएब आज़म ने ये खबर delhiuplive को दी है।अपनी कड़ी म्हणत के बल पर जो मुकाम ओवैशी ने बनाया है उसका रंग उत्तर परदेश के युवा वर्ग से मिल रहे mim को समर्थन में साफ़ दिखाई दे रहा है ऐसा लग रहा है जैसे उत्तर परदेश में इक नए युग का अनावरण होने जा रहा है।लोगो में ख़ुशी की लहर है और ओवैशी की 170 सीटो पर जीत की भी हाल ही में भविष्य वाणी हुई है अब देखना ये है क्या ओवैशी उत्तर परदेश के लोगो के दिलो में अपने लिए जगह बना पाये है या नहीं।
सावधान मोदी हा में गोसेवक हु जिसमे दम हो करे करवाई मुझपर:पवन पाण्डेय जिलाध्यक्ष
(जो लोग गौमाता के इस विषय पर असहमत हों वो मुझे फ़ौरन ब्लाक करें)
"लाइक कमेंट न करना, दो मिनट निकालकर पूरा पढ़ें, सभी पॉइंट्स पर सटीक जवाव लिखा है"
अगर गौसेवा करना गुंडागर्दी लगती है तो हाँ मैं गुंडा हूँ क्योंकि मैं गौसेवक हूँ !!
शर्म करो मोदी जी ! दो साल से एक बार भी कसाइयों के खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोला, और 80% गौ सेवकों/रक्षकों को गुंडा बताते हो।
क्या कसाई तुम्हारे मेहमान है! शर्म आनी चाहिए तुम्हें गाय का क़त्ल तो बन्द नहीं करा पाये उलटे 80% गौसेवकों पर हमला करके कसाइयों की हिमाकत करते हो। यदि रात को सड़कों पर रात रात भर जाग कर और नाका बंदी करके कसाइयों से गौमाता की रक्षा करने वाले गुंडे , बदमाश हैं तो हाँ मैं भी उनमें से एक हूँ !
रही बात गौमाता को प्लास्टिक खाने से रोकने की तो सत्ता गौमाता के नाम पर और हिंदुत्व के नाम पर तुमने भीख मांग कर पायी है और प्लास्टिक पर पूर्ण बंदी करना तुम्हारा काम है गौरक्षकों का नहीं, कतलखानों से करोडो रूपये टैक्स भी वसूलोगे, लाइसेंस भी तुम दोंगे और प्लास्टिक खाने से गौभक्त रोकें ? शर्म करो शर्म !
रात रात भर यदि गौरक्षक न जागें तो ये तुम्हारे गौहत्यारे गौमाता का वंश ही नही रहने देंगे !
रही बात फर्जी गौसेवकों/रक्षकों की तो वे सारे के सारे तुमसे परिचित नेता हैं जो एयरकंडीशन आफिसों में बैठ कर गौरक्षा का दावा करते हैं और तुम्हारे बनाये गौरक्षा प्रकोष्ठों से करोड़ों रूपये डकार रहे हैं !
मैं सिर्फ विचारों और अपने भाइयों का भक्त हूँ, किसी पार्टी का नहीं। 60% से भी ज्यादा गौसेवा बजरंगदल, विश्व हिन्दू परिषद और आरएसएस से जुड़े लोग करते हैं, लगभग 10% के आस-पास इन संगठनों के अलावा भी लोग गौसेवा करते हैं, कुल मिलाकर लगभग 70% लोग सच्चे गौसेवक हैं, पर बात तो 70-80% लोगों के धंधावाज होने, अपराधी होने की है, 20-30% तो चलो नकली गौसेवकों पर कार्यवाही करोगे और बाकी बचे 50% लोग इन 70% सच्चे गौसेवकों में छांटकर इन पर कार्रवाई होगी।
हमें गर्व है कि मैं अपने साथियों सहित बजरंगदल, विहिप, आरएसएस से जुड़ा हूँ। हम हर गलत बात पर मन कर्म वचन तीनों से विरोध करेंगे। दरअसल एक ख़ास पार्टी से बहुत उम्मीदें थीं, पर उसने भी गंगा मैया बोल के गंदे नाले में कुदा दिया, बहुत आक्रोश है सब भाइयों में, इसलिए आमोद-प्रमोद और हास्य रस समझ नहीँ आ रहा है।
कृपया हम सभी भाइयों की मनोस्थिति समझने की वजाय महसूस कीजिये और आशीर्वाद दीजिये कि हमसब मिलकर "नवयुग" ला पाएंगे।।
इन गौसेवकों ने आपको गौरक्षा, राम मंदिर, धारा 370 हिंदुत्व जैसी बातों पर प्रधानमंत्री पद पर बैठाया और अब आप इन्हीं पर कार्रवाई करवाओगे।
घोर शर्मनाक।।
मोदी जी के अनुसार 70-80% गौसेवक गौसेवा के नाम पर दूकान चलाते हैं, रात में असामाजिक गतिविधियाँ करते हैं, अपराधी हैं, राज्य सरकारें गौसेवकों पर कार्रवाई की योजना बनाना शुरू करें,। हाँ मैं गौसेवा करता हूँ अगर तुममें किसी में दम हो तो आओ और कार्रवाई हम पर।।
इसलिए मोदी सावधान !
कहीं गौमाता तुम्हारा अस्तित्व ही न समाप्त कर दें !
इसलिए गौमाता और गौसेवकों/रक्षकों पर बोलने से पहले हजार बार विचार करके मुंह खोलो ।
हम गौसेवक/भक्त हैं, किसी के अंधभक्त नहीं ।
जय जय गौमाता, जय जय भारतमाता।।
वन्देमातरम, जय हिन्द।।
आपका अपना
पवन पाण्डेय जनसेवक
94 555 19 819
जिलाध्यक्ष राष्ट्र स्वाभिमान ट्रस्ट
एवं
संस्थापक सदस्य
जलालाबाद विकास मंच
जनपद शाहजहाँपुर उत्तर प्रदेश
"लाइक कमेंट न करना, दो मिनट निकालकर पूरा पढ़ें, सभी पॉइंट्स पर सटीक जवाव लिखा है"
अगर गौसेवा करना गुंडागर्दी लगती है तो हाँ मैं गुंडा हूँ क्योंकि मैं गौसेवक हूँ !!
शर्म करो मोदी जी ! दो साल से एक बार भी कसाइयों के खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोला, और 80% गौ सेवकों/रक्षकों को गुंडा बताते हो।
क्या कसाई तुम्हारे मेहमान है! शर्म आनी चाहिए तुम्हें गाय का क़त्ल तो बन्द नहीं करा पाये उलटे 80% गौसेवकों पर हमला करके कसाइयों की हिमाकत करते हो। यदि रात को सड़कों पर रात रात भर जाग कर और नाका बंदी करके कसाइयों से गौमाता की रक्षा करने वाले गुंडे , बदमाश हैं तो हाँ मैं भी उनमें से एक हूँ !
रही बात गौमाता को प्लास्टिक खाने से रोकने की तो सत्ता गौमाता के नाम पर और हिंदुत्व के नाम पर तुमने भीख मांग कर पायी है और प्लास्टिक पर पूर्ण बंदी करना तुम्हारा काम है गौरक्षकों का नहीं, कतलखानों से करोडो रूपये टैक्स भी वसूलोगे, लाइसेंस भी तुम दोंगे और प्लास्टिक खाने से गौभक्त रोकें ? शर्म करो शर्म !
रात रात भर यदि गौरक्षक न जागें तो ये तुम्हारे गौहत्यारे गौमाता का वंश ही नही रहने देंगे !
रही बात फर्जी गौसेवकों/रक्षकों की तो वे सारे के सारे तुमसे परिचित नेता हैं जो एयरकंडीशन आफिसों में बैठ कर गौरक्षा का दावा करते हैं और तुम्हारे बनाये गौरक्षा प्रकोष्ठों से करोड़ों रूपये डकार रहे हैं !
मैं सिर्फ विचारों और अपने भाइयों का भक्त हूँ, किसी पार्टी का नहीं। 60% से भी ज्यादा गौसेवा बजरंगदल, विश्व हिन्दू परिषद और आरएसएस से जुड़े लोग करते हैं, लगभग 10% के आस-पास इन संगठनों के अलावा भी लोग गौसेवा करते हैं, कुल मिलाकर लगभग 70% लोग सच्चे गौसेवक हैं, पर बात तो 70-80% लोगों के धंधावाज होने, अपराधी होने की है, 20-30% तो चलो नकली गौसेवकों पर कार्यवाही करोगे और बाकी बचे 50% लोग इन 70% सच्चे गौसेवकों में छांटकर इन पर कार्रवाई होगी।
हमें गर्व है कि मैं अपने साथियों सहित बजरंगदल, विहिप, आरएसएस से जुड़ा हूँ। हम हर गलत बात पर मन कर्म वचन तीनों से विरोध करेंगे। दरअसल एक ख़ास पार्टी से बहुत उम्मीदें थीं, पर उसने भी गंगा मैया बोल के गंदे नाले में कुदा दिया, बहुत आक्रोश है सब भाइयों में, इसलिए आमोद-प्रमोद और हास्य रस समझ नहीँ आ रहा है।
कृपया हम सभी भाइयों की मनोस्थिति समझने की वजाय महसूस कीजिये और आशीर्वाद दीजिये कि हमसब मिलकर "नवयुग" ला पाएंगे।।
इन गौसेवकों ने आपको गौरक्षा, राम मंदिर, धारा 370 हिंदुत्व जैसी बातों पर प्रधानमंत्री पद पर बैठाया और अब आप इन्हीं पर कार्रवाई करवाओगे।
घोर शर्मनाक।।
मोदी जी के अनुसार 70-80% गौसेवक गौसेवा के नाम पर दूकान चलाते हैं, रात में असामाजिक गतिविधियाँ करते हैं, अपराधी हैं, राज्य सरकारें गौसेवकों पर कार्रवाई की योजना बनाना शुरू करें,। हाँ मैं गौसेवा करता हूँ अगर तुममें किसी में दम हो तो आओ और कार्रवाई हम पर।।
इसलिए मोदी सावधान !
कहीं गौमाता तुम्हारा अस्तित्व ही न समाप्त कर दें !
इसलिए गौमाता और गौसेवकों/रक्षकों पर बोलने से पहले हजार बार विचार करके मुंह खोलो ।
हम गौसेवक/भक्त हैं, किसी के अंधभक्त नहीं ।
जय जय गौमाता, जय जय भारतमाता।।
वन्देमातरम, जय हिन्द।।
आपका अपना
पवन पाण्डेय जनसेवक
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जिलाध्यक्ष राष्ट्र स्वाभिमान ट्रस्ट
एवं
संस्थापक सदस्य
जलालाबाद विकास मंच
जनपद शाहजहाँपुर उत्तर प्रदेश
Tuesday, 9 August 2016
ताजमहल या तेजोमहालय... क्या है हकीकत?
सोशल मीडिया पर ताजमहल के हिन्दू इमारत होने संबंधी पोस्ट काफी शेयर की जा रही हैं। दरअसल यह मामला उस वक्त उठा जब ‘ताजमहल- सत्यकथा’ नामक पुस्तक का प्रकाशन हुआ। आइये आपको बताते हैं किसने लिखी यह किताब और ताजमहल को हिन्दू इमारत बताने के लिए क्या तर्क दिए गए हैं।ओक ने लिखी थी किताबपुरूषोत्तम नागेश ओक का जन्म उन्हीं की एक पुस्तक में दिए परिचय अनुसार इंदौर, मध्यप्रदेश में हुआ था। श्री ओक ने द्वितीय विश्व युद्ध के समय इंडियननेशनल आर्मी में प्रविष्टि ली, जिसके द्वारा इन्होंने जापानियों के संग अंग्रेज़ों से लड़ाई कीथी। इन्होंने कला में स्नातकोत्तर (एम०ए०) एवं विधि स्नातक (एलएल०बी०) की डिग्रियाँ मुंबई विश्वविद्यालय से ली थीं। सन 1947 से 1953 तक वेहिंदुस्तान टाइम्स एवं द स्टेट्समैन जैसे समाचार पत्रों के रिपोर्टर रहे। 1953 से 1957 तक इन्होंने भारतीय केन्द्रीय रेडियो एवं जन मंत्रालय में कार्य किया। 1957 से 1959 तक उन्होंने भारत के अमरीकी दूतावास में कार्य किया।2007 में हो चुकी है मृत्युश्री ओक की मृत्यु 7 दिसम्बर 2007 को हो गयी। उन्हें पीएन ओक के नाम से भी जाना जाता है।शाहजहां ने किया कब्जा, ताजमहल था शिव मंदिरअपनी पुस्तक ताजमहल: सत्य कथा में, ओक ने यह दावा किया है, कि ताजमहल, मूलत: एक शिव मन्दिर या एक राजपूताना महल था, जिसे शाहजहां ने कब्ज़ा करके एक मकबरे में बदल दिया।ओक कहते हैं, कि कैसे सभी (अधिकांश) हिन्दू मूल की कश्मीर से कन्याकुमारी पर्यन्त इमारतों को किसी ना किसी मुस्लिम शासक या उसके दरबारियों के साथ, फेर-बदल करके या बिना फेरबदल के, जोड़ दिया गया है। उन्होंने हुमायुं का मकबरा, अकबर का मकबरा एवं एतमादुद्दौला के मकबरे, तथा अधिकांश भारतीय हिन्दू ऐतिहासिक इमारतों, यहाँ तक कि काबा, स्टोनहेन्ज व वैटिकन शहर तक हिन्दू मूल के बताये हैं। ओक का भारत में मुस्लिम स्थापत्य को नकारना, मराठी जग-प्रसिद्ध संस्कृति का अत्यन्त मुस्लिम विरोधी अंगों में से एक बताया गया है। के०एन०पणिक्कर ने ओक के भारतीय राष्ट्रवाद में कार्य को भारतीय इतिहास की साम्प्रदायिक समझ बताया है। तपन रायचौधरी के अनुसार, उन्हें संघ परिवार द्वारा आदरणीय इतिहासविद कहा गया है।ओक ने दावा किया है, कि ताज से हिन्दू अलंकरण एवं चिह्न हटा दिये गये हैं और जिन कक्षों में उन वस्तुओं एवं मूल मन्दिर के शिव लिंग को छुपाया गयाहै, उन्हें सील कर दिया गया है। साथ ही यह भी कि मुमताज महल को उसकी कब्र में दफनाया ही नहीं गया था।ताजमहल के हिन्दू शिवमन्दिर होने के पक्ष में ओक के तर्क*.पी०एन० ओक अपनी पुस्तक "ताजमहल ए हिन्दू टेम्पल" में सौ से भी अधिक कथित प्रमाण एवं तर्क देकर दावा करते हैं कि ताजमहल वास्तव में शिव मन्दिर था जिसका असली नाम 'तेजोमहालय' हुआ करता था। ओक साहब यह भी मानते हैं कि इस मन्दिर को जयपुर के राजा मानसिंह (प्रथम) ने बनवाया था जिसे तोड़ कर ताजमहल बनवाया गया। इस सम्बन्ध में उनके निम्न तर्क विचारणीय हैं:*.किसी भी मुस्लिम इमारत के नाम के साथकभी महल शब्द प्रयोग नहीं हुआ है।*.'ताज' और 'महल' दोनों ही संस्कृत मूल के शब्द हैं।*.संगमरमर की सीढ़ियाँ चढ़ने के पहले जूते उतारने की परम्परा चली आ रही हैजैसी मन्दिरों में प्रवेश पर होती है जब कि सामान्यत: किसी मक़बरे में जाने के लिये जूता उतारना अनिवार्य नहीं होता।*.संगमरमर की जाली में 108 कलश चित्रित हैं तथा उसके ऊपर 108 कलश आरूढ़ हैं, हिंदू मन्दिर परम्परा में (भी) 108 की संख्या को पवित्र माना जाता है।*.ताजमहल शिव मन्दिर को इंगित करने वाले शब्द 'तेजोमहालय' शब्द का अपभ्रंश है। तेजोमहालय मन्दिर में अग्रेश्वर महादेव प्रतिष्ठित थे।*.ताज के दक्षिण में एक पुरानी पशुशाला है। वहाँ तेजोमहालय के पालतू गायों को बाँधा जाता था। मुस्लिम कब्र में गौशाला होना एक असंगत बात है।*.ताज के पश्चिमी छोर में लाल पत्थरों के अनेक उपभवन हैं जो कब्र की तामीर के सन्दर्भ में अनावश्यक हैं।*.संपूर्ण ताज परिसर में 400 से 500 कमरे तथा दीवारें हैं। कब्र जैसे स्थान में इतने सारे रिहाइशी कमरों का होना समझ से बाहर की बात है।कोर्ट में रद्द हो गयी थी याचिकाओक ने याचिका भी दायर की थी। जिसमें उन्होंने ताज को एक हिन्दू स्मारक घोषित करतने एवं कब्रों तथा सील्ड कक्षों को खोलने व देखने कि उनमें शिव लिंग या अन्य मंदिर के अवशेष हैं या नहीं की अपील की। सन 2000 में सुप्रीम कोर्ट ने ओक की इस याचिका को रद्द कर दिया और साथ ही झिड़की भी दी थी कि उनके दिमाग में ताज के लिए कोई कीड़ा है।
बाबरी मस्जिद का दर्द...
23 बरस बाद बाबरी अविनाश कुमार पांडे ‘समर’ बाबरी कभी एक मस्जिद का नाम होता था, अब इस देश के सीने में पैबस्त खंजर का नाम है. वो खंजर जिसे लेकर एक पूरी पीढ़ी जवान हो गयी. वो जिसने बाबरी को बस तस्वीरों में देखा है, तकरीरों में सुना है. शुक्र है कि मैं उस पीढ़ी का नहीं हूँ. उम्र भले बहुत कम रही हो मैं उन लोगों में से हूँ जिन्होंने बाबरी को देखा है और बारहा देखा है.देखता भी कैसे नहीं, बाबरी और हनुमान गढ़ी दोनों वाली अयोध्या से कुल 28 किलोमीटर दूर गाँव की रिहाइश वाले मेरे लिए बाबरी जिंदगी के मील पत्थरों में से रही है, ठीक वैसे जैसे हनुमान गढ़ी या राम की पैड़ी थी. बचपन में अयोध्या के उस पार नानी के घर आनेजाने और फिर ग्रेजुएशन के लिए इलाहाबाद रसीद हो जाने के बाद वो मील पत्थर जिन्हें पार करना हो होता था, जिनसे हजार यादें पैबस्ता थीं. तब बाबरी चौंकाती थी, कि अखबारों में जब तब उसका जिक्र हवादिस के सबब से ही आता था और यहाँ बाबरी थी, उस अयोध्या में जिसमे कभी कोई दंगा न हुआ था. अयोध्या के पार हम थे उस बस्ती में फिर सेजहाँ कभी कोई दंगा न हुआ था. बाबरी चौंकाती थी कि शहर में सबसे ज्यादा लोगों को रोटी रामनामी और खंड़ाऊं बना के बेच के मिलती थी और ये दोनों ही काम ज्यादातर मुसलमान करते थे. तब समझ नहीं आता था कि सरयू किनारे बसे इस छोटे से मुफस्सिल कस्बे में इसजरा सी इमारत के लिए पूरे साउथ एशिया में फसाद क्यों होते रहते हैं. पर फिर तब ये भी कहाँ पता था कि ये इमारत जरा सी इमारत नहीं सैकड़ों साल का माजी अपने में समाये गंगाजमनी तहजीब का परचम है.उस तहजीब का जिसमे जातिपात से लेकर हजार बुराइयां थीं पर कम से कम मजहब के नाम पर फैलाया जाने वाला जहर नहीं था. बेशक तब भी लोग कभी कभी लड़ लेते थे, अपनी अच्छाइयां और बुराइयाँ दोनों समेटे बैठे आम से लोग थे आखिर, दुनिया में हर जगह लड़ते हैं. पर फिरवे लड़ाइयाँ ख़त्म हो जाती थीं, एक दूसरे से अफ़सोस जता लोग फिर एक हो जाते थे. हाँ, बाबरी को देखते हुएकभी डर न लगता था. ठीक है कि हर अगली बार गुजरने के वक़्त खाकी वर्दियां थोड़ी और बढ़ गयी होती थीं, हर बार बड़ों की आँखों में थोडा और तनाव, थोड़ा और डर पसरजाता था पर बस, बात उतने पर ही ख़त्म भी हो जाती थी. लोगों को यकीन होता था कि मामला अदालत में है, एक दिन फैसला हो ही जाएगा. पर फिर एक दिन फैसला तो हुआ पर अदालत ने नहीं किया, हिन्दू धर्म के स्वयंभू (खुदमुख़्तार) ठेकेदारों ने कर दिया. तैयारी तो वो बहुत पहले से कर रहे थे और अफ़सोस कि उस तैयारी में तब की सरकारें उनसे लड़ नहीं रही थीं बल्कि उनकी मदद कर रही थीं.6 दिसंबर 1992 को बाबरी शहीद की गयी थी पर बस उसी दिन नहीं की गयी थी. बाबरी 1949 में तब भी शहीद की गयी थी जब रातों रात एक तालाबंद कमरे में भगवान् राम की मूर्ति रख दी गयी थी. फिर 1986 में भी जब डिस्ट्रिक्ट जज ने विवादित जगह पर ताले खोल हिन्दुओं को पूजा का अधिकार दे दिया था, उसी जज ने जो बाद में भारतीय जनता पार्टी का सांसद हुआ. बाबरी1989 में भी शहीद हुई थी जब तब की कांग्रेस सरकार ने विवादित जगह के ठीक बगल विश्व हिन्दू परिषद को शिलापूजन (नींव रखने) की इजाजत दे दी थी. 6 दिसंबर 1992 को तो बस ये हुआ था कि बाबरी के साथ बहुत कुछ शहीद हो गया था, अमन, गंगाजमनी तहजीब और लोगों का एक दूसरे में यकीन, बहुत कुछ. पर उससे भी बड़ा था कुछ जिस पर उस दिन हमला हुआ था. ये हमला इस मुल्क में इन्साफ की, हक की रवायतों पर था. बाबरी ऐसे ही नहीं शहीद कर दी गयी थी. बाबरी के शहीद होने के एक दिन पहले सूबे के तत्कालीन भाजपाई मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने सुप्रीम कोर्ट को लिखित हलफनामा दिया था कि वे बतौर मुख्यमंत्री बाबरी की हिफाज़त करेंगे.सुप्रीम कोर्ट और तत्कालीन कांग्रेसी केंद्र सरकार ने इस हलफनामे पर यकीन किया और फिर कल्याण सिंह की सरपरस्ती और लालकृष्ण आडवानी, मुरली मनोहरजोशी, उमा भारती, साध्वी ऋतंभरा और विनय कटियार जैसे भाजपा/विश्व हिन्दू परिषद के तमाम कद्दावर नेताओं की उपस्थिति में बाबरी जमींदोज कर दी गयी. फिर उस हलफनामे का क्या हुआ? सुप्रीम कोर्ट ने उस पर कोई कार्यवाही क्यों नहीं की? सुप्रीम कोर्ट ने कार्यवाही की. सालों बाद कल्याण सिंह को अदालत की अवमानना के लिए एक दिन के लिए जेल भेजने की सख्तकार्यवाही की. अभी कल्याण सिंह कहाँ है? अभी कल्याण सिंह भारत के सबसे बड़े सांविधानिक पदों में से एक राज्यपाल पर बैठ देश के सबसे बड़े राज्य राजस्थान के मुखिया हैं.6 दिसंबर 1992 को इस देश की अकिलियत का सुप्रीम कोर्ट में, इन्साफ में भरोसा बच भी गया हो तो भी अब वह इसी ऐतबार के साथ कह पाना जरा मुश्किल है. सवाल सिर्फ कल्याण सिंह का नहीं था. बाद में साफ़ ही हो गया कि बाबरी को शहीद करना कोई हादसा नहीं एक सोची समझी साजिश थी. वह साजिश जिसमें हलफनामा देकर केंद्र सरकार को कारसेवकों के आने के पहले उत्तर प्रदेश के निज़ाम को बर्खास्त करने से बचा जा सके. मान भी लें कि इस साजिश में केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव नहीं शामिल थे तो बाबरी पर हमले के बाद उन्होंने तुरंत कार्यवाही क्यों नहीं की? बाबरी छोटीमोटी इमारत नहीं, 400 साल से खड़ी एक मजबूत ईमारत थी, ऐसी की उसे गिराने में घंटों लगे थे. नरसिम्हाराव सरकार हमला होते हीराष्ट्रपति शासन लगा सकती थी, उसने शाम भर और कल्याण सिंह के इस्तीफे (दोनों लगभग साथ ही हुए थे) का इन्तेजार क्यों किया? ऐसा भी नहीं कि केंद्र सरकार के पास फैजाबाद में संसाधन नहीं थे, कमिश्नरी मुख्यालय होने के साथ साथ फैजाबाद हिन्दुस्तानी फौज की डोगरा रेजिमेंट का मुख्यालय भी है और बाबरी की सुरक्षा में उन्हें मोबिलाइज करने में ज्यादा वक़्त न लगता.अफ़सोस यह कि लोगों का, अकिलियत का ही सही, इन्साफ में, अदालतों में, सरकार में यकीन टूट जाए तो बहुत कुछ टूट जाता है. आडवाणी की रथयात्रा ने अपने पीछे हुए दंगों में खून की एक नदी छोड़ी थी. बाबरी की शहादत ने इस नदी को समन्दर में बदल देना था. 6 दिसंबर 1992 के घंटों भर बाद देश सुलग उठा था और इस आग ने कम से कम 2000 हिन्दुस्तानियों को निगल लिया था. पर फिर यह संख्या 2000 भी कहाँ? उसके बादके तमाम दंगे फिर धीरे धीरे नरसंहारों में बदलने लगे थे और अकिलियत का गुस्सा बदलों में. मुझे साजिश के सिद्धांतों में कोई यकीन नहीं पर मैं जानता हूँ कि 1992 के पहले बाहर गए बेटे की माँ, बीबी का पति बम धमाकों के डर से हलकान नहीं रहता था.हिंदुस्तान ने उसके पहले भी तमाम हवादिस झेले थे पर वह उनकी सोच का हिस्सा नहीं बना था. खालिस्तान और ऑपरेशन ब्लू स्टार दोनों होकर गुजर चुके थे पर उनकी लपटें पंजाब और दिल्ली के बाहर तक नहीं पंहुचीं थीं. अबकी वाली आग की जद में पूरा हिंदुस्तान था. पर फिर सिर्फ हिंदुस्तान भी कहाँ? उस दिन के बाद से वो सोया सा कस्बा क़स्बा नहीं, पूरेपूरे साउथ एशिया भर में अकिलियत के लिए डर का दूसरा नाम बन गया. न न, सिर्फ हिंदुस्तान की मुस्लिम अकिलियत के लिए ही नहीं, पाकिस्तान और बांग्लादेश की हिन्दू अकिलियत के भी. यहाँ कुछ करिए और बांग्लादेश के हिन्दुओं की रीढ़ में डर उतरआएगा. आये भी कैसे नहीं, यहाँ की एक मस्जिद, जिसमे इबादत तक बंद थी, का बदला बांग्लादेश के फ़सादियों ने, पाकिस्तान के फ़सादियों ने अपने यहाँ के हिन्दुओं से जो लिया था. बाबरी की शहादत पर, बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर, हिंदुत्ववादी कट्टरपंथ के उभार पर पहले भी बहुत बार लिखा है. जो नहीं लिखा है वह यह कि जब बाबरी ढाई गयी तब मैं आरएसएस के बनाये पहले सरस्वती शिशु मंदिर में पढता था उसी के छात्रावास में रहता था. शिशु मंदिरों के छात्रावासों में शाखा जाना अनिवार्य होता है तो शाखा भी जाता था. खेलना कूदना अच्छा भी लगता था. बौद्धिकों में आने वाले राष्ट्रप्रेम, समरसता जैसे शब्दों को सुनकर लगता था कि ये भले लोग हैं. वैसे भी 13 साल की उम्र बहुत कुछ जानने समझने की कहाँ होती है? पर उस दिन हवाओं में उतर आया तनाव आज भी याद है. आरएसएस का स्कूल होने की वजह से मामला संवेदनशील था, बाबरी पर हमला होते होते तो पुलिस ने हिफाज़त के लिए पूरी तरह से घेर लिया था. फिर शाम तक आचार्य जी (उस्तादों) के चेहरेपर उतर आई मुस्कुराहटों ने बहुत कुछ साफ़ कर दिया था. हाँ उस दिन शाखा नहीं आरएसएस पर प्रतिबंध लगा था.अविनाश कुमार पांडे ‘समर’फिर हम लोग भीतर बुलाये गए कि आज शाखा भीतर लगेगी. मुझे अब भी याद है कि मैंने बस इतना पूछा था कि अपनी थी तो क्यूं ढहा दी? कोर्ट के फैसले का इन्तेजार क्यों नहीं किया? उनकी थी तो क्यों ढहा दी. ये अपने हम और उन के फरक से परे इंसान बनने की राहों पर चलने की शुरुआत थी. उस दिन मन से आरएसएस के अच्छे होने का यकीन भी दरका था और बस यही एक दरकना अच्छा था. आज इतने साल बाद बाबरी को याद करताहूँ तो लगता है कि अपनी कौम, हिन्दुस्तानी कौम, की दिक्कत बस इतनी है कि वह माजी को ज्यादा देर याद नहीं रखता. मुल्क का बंटवारा याद रखा होता, उसमे बहा खून याद रखा होता तो शायद 1984 न होता. 1984 याद रखा होता तो शायद 1992 न होता. हाँ 1992 के बाद की कहानी अलग है. उसके बाद की कहानी हिंदुस्तान के हिन्दू पाकिस्तान बनने की राह पर चल पड़ने की कहानी है. वक़्त अब भी है, काश हम रोक पायें.(लेखक हांगकांग में एशियन ह्यूमनराईट कमीशन के प्रोग्राम कॉ-आर्डिनेटर हैं)
गर्लफ्रेंड पर करा रहा था तंत्र-मंत्र, लेकिन...
प्यार में असफल, व्यापार में परेशानी, शादी न होना, घरेलू झगडे़... यही कुछ कारण हैं जिनसे परेशां लोग अक्सर आमिलों व तांत्रिकों के झांसे में आकर अपनी मेहनत की कमाई के साथ-साथ अपना चैन-सुकून भी गवां देते हैं। रूहानी इलाज, जादू-टोना, काला जादू... ये कुछ ऐसे नाम हैं जिनके नामपर भोले-भाले व परेशां लोगों की मेहनत की कमाई को सरेआम ठगा जाता है। अशिक्षित नहीं, पढ़े-लिखे व उच्च शिक्षित लोग भी बड़ी आसानी से इस मुसीबत में फंस जाते हैं। नाम न छापने की शर्त पर एक युवक ने हमसे साझा की अपनी कहानी।देते हैं 100 % गारंटी एमकॉम कर चुका एक युवक विदेश से पैसा कमा कर दो वर्ष बाद अपने देश लौटा। इसी दरमियां उसका अपनी गर्लफ्रेंड से ब्रेकअप हो गया। हजार मिन्नतों व समझाने के बाद भी कोई फायदा नहीं हुआ। एक दिन यूं ही सफर के दौरान बस में उसे एक पंपलेट पड़ा हुआ मिला। जिसपर किसी राजस्थान के बाबा का पता व फोन नम्बर लिखा हुआ था। उस विज्ञापन में जादू-टोना, वशीकरण की 100 प्रतिशत गारंटी दी गई थी। इतना ही नहीं काम न होने पर पैसा वापसी की भी पूरी गारंटी थी। युवक को कुछ गड़बड़ तो लगी, लेकिन उसने फिर भी पंपलेट को जेब में रख लिया। तनाव का शिकार युवक की कुछ दिनों बाद उस पंपलेट पर नज़र पड़ी तो उसने सोचा एक बार संपर्क करने में भला हर्ज ही क्या है? यही सोच कर युवक ने दिए गए नम्बर पर संपर्क साधा। ऐसे देते हैं झांसा युवक ने सामने वाले व्यक्ति को अपने परेशानी बतायी। कथित बाबा ने नाम, गर्लफ्रेंड व उसके मां-बाप का नाम पूछकर दस मिनट में कॉल करने को कहा।युवक ने दस मिनट बाद जब कॉल किया तो जवाब मिला तुम दोनों को अलग करने के लिए किसी ने काला जादू कराया है। इतना सुनते ही पहले से तनाव से ग्रस्त युवक की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गयी। उसने हल मालूम किया तो जबाव मिला तीन हजार रूपये का खर्चा है। 100% गारंटी है चंद घंटों में ही तुम्हारी महबूबा तुम्हारी गुलाम बन जाएगी, जो तुम चाहोगे वो होगा। युवक ने सोच विचार कर जवाब देने के बाद कॉल करने कोकहा। रात भर उसने सोचा और सोचा कि वैसे भी अपने प्यार के बिना तो वैसे ही वह जिंदा नहीं रह सकता, फिर तीन हजार रूपये देने में हर्ज ही क्या है? तीन हजार रूपये की अहमियत उसकी जिंदगी से अधिक तो नहींहो सकती।अगली सुबह युवक ने उस नम्बर पर फिर से कॉल किया और पूछा कि पैसे कैसे पहुंचाने हैं। कथित बाबा ने एक बैंक एकाउंट नम्बर एसएमएस किया। युवक ने बैंक जाकर बताए गए एकाउंट में 3000 रूपये जमा कर दिए। इसके बाद युवक ने फिर से कॉल की तो रात आठ बजे कॉल करने को कहा गया। बताए गए समय पर कॉल करने पर इधर-उधर की तमाम बातों के बाद कहा कि बेटा मैंने वशीकरण कर दिया है, तुम्हें सुबह तक असर दिख जाएगा।मांगे जाते हैं और पैसे युवक उत्सुकता में रात भर नहीं सोया। सुबह 11 बजे कथित बाबा का स्वयं कॉल आया। उसने युवक से कहा कि बेटा तुम्हारे काम में कुछ बाधा आ रही है तुम्हे एक पहाड़ी ऊल्लू की भेंट चढ़ानी होगी। युवक ने पूछा कि ऊल्लू कहां मिलेगा तो जवाब मिलेगा हम ऊल्लू खुदखरीद लेंगे तुम उसी एकाउंट में 6000 रूपये और जमाकर दो।युवक को कुछ अजीब लगा तो उसने अपने एक मित्र को पूरा माजरा बताया। उसके मित्र ने अपने सामने उस नम्बर पर कॉल करने को कहा। इस पर युवक ने कॉल करके कहा कि मैं खुद ऊल्लू खरीद लूंगा क्या करना है बताओ? कथित बाबा गुस्सा हो गया और बोला वो ऊल्लू तुम्हें मिल ही नहीं सकता। अगर 6000 नहीं दे सकतेतो भूल जाओ तुम्हारा काम नहीं होगा। युवक ने कहा उसके पास 6000 रूपये नहीं हैं तो जवाब मिला 3000अब दे दो बाकि काम होने के बाद दे देना। इसी तरह मोलभाव करते-करते कथित बाबा 700 रूपये तक आ गया। युवक रूपये जमा करने जाने लगा। लेकिन उसके मित्र ने उसे रोक लिया और स्वयं बात करते हुए कहा कि पहलेरिजल्ट दिखाओ तब ही पैसा मिलेगा। कथित बाबा ने गालियां व धमकियां देनी शुरू कर दीं। 10 मिनट बाद एक एसएमएस मिला जिसमें लिखा था एक घंटे के अंदर देख लेना मैं तुम्हारे ऊपर काला जादू कर रहा हूं। अब तुम ही जिम्मेदार हो। युवक परेशान हो गया और पैसा जमा करने के लिए जाने लगा। लेकिन उसके मित्र ने उसे रोक लिया। और आज चार माह बीत चुके हैं, वक्त कुछ यूं बदला कि युवक अपने ब्रेकअप के दर्द से बाहर आ गया।फोटो: प्रतीकात्मक
मुल्क की सबसे छोटी उम्र की पायलट हैं ‘आयशा अज़ीज़’
“हर बार जब भी मुझे अपने गाँव जाने का मौका मिलता तो मैं ख़ुशी से भर जाती थी, प्लेन के टेकऑफ और लैंडकरने के वक़्त जहाँ मुझे रोमांच का एहसास होता था वहीँ मेरा भाई बिलकुल डरा हुआ रहता था” यह बात कही है 20 साल की आयशा अज़ीज़ ने अपने इंटरव्यू के दौरान जब वो अपने प्लेन उड़ाने के सपने के शुरू होने की बात करती हैं”।आज हम बात कर रहे हैं एक ऐसी पायलट की जिसके नाम पर देश की सबसे छोटी उम्र में पायलट लाइसेंस अपने नामकरा लेने का रिकॉर्ड दर्ज है। मिलिए आयशा अज़ीज़ से जिसने १६ साल की उम्र में ही प्लेन उड़ाने का वोख्वाब पूरा कर लिया जिसे लेकर वो बचपन से जवानी तक पहुंची थीं।सिआसत की रिपोर्ट के अनुसार मुंबई में रहने वाली 20 बरस की आयशा अज़ीज़ ने शुरू से ही कुछ अलग और अनोखा करने का सपना देखा था। उसके इसी सपने को पहचान उसके माता-पिता ने उसे हाई स्कूल के बाद फ्लाइंग स्कूल में दाखिल करवाया। और जैसे ही आयशा उम्र में 16 साल की हुई तो उसने सभी टेस्ट पास करके स्टूडेंट पायलट लाइसेंस हासिल कर लिया। हालाँकि उसके बाद कमर्शियल पायलट लाइसेंस हासिल करने के लिए आयशा को पैसों की तंगी की वजह से इंतज़ार करना पड़ा लेकिन उसका इंतज़ार जल्द ही खत्म हो गया और आज के वक़्त में आयशा बॉम्बे फ्लाइंग क्लब में बीएससी एविएशन के तीसरे साल की पढ़ाई कर रही 4 लड़कियों में से एक है। और जल्द ही कमर्शियल पायलट्स का लाइसेंस मिलने के बाद किसी बड़ी एयरलाइन के साथ काम करने की तैयारी में है।
14वें बच्चे को जन्म देने के बाद मौत की नींद सो गई थीं मुमताज, शाहजहां से लिए थे ये 2 वादे…
प्रेम के सबसे बड़े प्रतीक ताजमहल को बनवाने वाले शाहजहां की बेगम मुमताज की मौत बेहद दर्दनाक थी। लगभग 30 घंटे तक 14वें बच्चे की प्रसव पीड़ा से जूझने के बाद 17 जून 1631 की सुबह उसने तड़पते हुए प्राण त्यागे थे। शाहजहां, मुमताज से बेहद प्यार करता था। 16 जून, 1631 की रात मुमताज को प्रसव पीड़ा बढ़ गई। मुमताज प्रसव पीड़ा से तड़प रही थी, उस वक्त शाहजहां डेक्कन के विद्रोह को खत्म करने के बाद कीरणनीति बना रहा था। उसे मुमताज की खराब हालत की सूचना मिली। इस दौरान वह मुमताज के पास नहीं गया। उसने दाइयों को भेजने के निर्देश दिए। 30 घंटे की लंबी जद्दोजहद के बाद मुमताज के आधी रात को एक बेटी गौहर आरा पैदा हुई। लेकिन मुमताज बेहाल थी। शाहजहां को अपने कमरे से कई संदेशवाहक भेजे, लेकिन कोई लौटकर नहीं आया। रात काफी हो चुकी थी। आधी रात से प्यादा का वक्त हो चुका था। शाहजहां ने खुद हरम में जाने का फैसला किया, तभी उसके पास संदेश आया, “बेगम ठीक हैं, लेकिन काफी थकी हुई हैं। बच्ची को जन्म देने के बाद मुमताज गहरी नींद में चली गई हैं। उन्हें परेशान न किया जाए। शाहजहां इसके बाद सोने के लिए अपने कमरे के अंदर चला गया। वह सोने हीवाला था तभी उसकी बेटी जहां आरा वहां पहुंची।द हुक न्यूज़ के अनुसार इसी दौरान तड़प रही मुमताज ने अपनी बेटी जहाँ आरा को पिता शाहजहां के पास बुलाने को भेजा। जब शाहजहां हरम पहुंचा, तो वहां उसने मुमताज को हकीमों से घिरा हुआ पाया। मुमताज छटपटा रही थी। वह मौत के करीब थी। मुमताज ने आखिरी वक्त पर शाहजहां से 2 वादे लिए। पहला वादा शादी न करने को लेकर था। जबकि दूसरा वादा एक ऐसा मकबरा बनवाने का था जो अनोखा हो।मुमताज की देखभाल करने वाली सती उन निसा ने उसके मृत शरीर को रूई के 5 कपड़ों में लपेट दिया। इस्लामिक हिदायतों के वावजूद उसकी मौत पर महिलाएंबुरी तरह रो-रोकर शोक जताती रहीं। मुमताज की मोत से बादशाह ही नहीं पूरा बुरहानपुर गमगीन हो गया था। किले की दीवारें औरतों के रोने की आवाज के भरभरा उठी। मुमताज के शव को ताप्ती नदी के किनारे जैनाबाग में जमानती तौर (अस्थाई) पर दफन कर दिया गया। मौत के 12 साल बाद शव को आगरा के निर्माणाधीनताजमहल में दफन किया गया।
मैसूर के शेर टीपू सुल्तान की असली ताकत उनकी
‘मैसूर का शेर’ कहे जाने वाले टीपू सुल्तान की असली ताकत उनकी रॉकेट प्रौद्योगिकी थी। उनके रॉकेट अंग्रेजों के लिए अनुसंधान का विषय बन गए थे।पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने एक बार बेंगलूर के टीपू सुल्तान शहीद मेमोरियल में अयोजित एक कार्यक्रम में टीपू को विश्व का सबसे पहला रॉकेट अविष्कारक करार दिया था।भारत के मिसाइल कार्यक्रम के जनक एपीजे अब्दुल कलाम ने अपनी किताब ‘विंग्स ऑफ़ फ़ायर’ में लिखा है कि उन्होंने नासा के एक सेंटर में टीपू की सेना की रॉकेट वाली पेंटिग देखी थी। कलाम लिखते हैं “मुझे ये लगा कि धरती के दूसरे सिरे पर युद्ध में सबसे पहले इस्तेमाल हुए रॉकेट और उनका इस्तेमाल करने वाले सुल्तान की दूरदृष्टि का जश्न मनाया जा रहा था। वहीं हमारे देश में लोग ये बात या तो जानते नहीं या उसको तवज्जो नहीं देते”।इतिहास के प्रोफेसर केके उपाध्याय के अनुसार टीपूकी सबसे बड़ी ताकत उनकी रॉकेट प्रौद्योगिकी थी। टीपू की सेना ने रॉकेटों के जरिए अंग्रेजों और निजामों को तितर बितर कर दिया था। ये दिवाली वाले रॉकेट से थोड़े ही लंबे होते थे। टीपू के ये रॉकेट इस मायने में क्रांतिकारी कहे जा सकते हैं कि इन्होंने भविष्य में रॉकेट बनाने की नींव रखी।टीपू की शहादत के बाद अंग्रेजों ने रंगपट्टनम में दो रॉकेटों पर कब्जा कर लिया था और वे इन्हें 18वीं सदी के अंत में ब्रिटेन स्थित वूलविच म्यूजियम आर्ट गैलरी में प्रदर्शनी के लिए ले गए थे।बीस नवम्बर 1750 को देवनहल्ली (वर्तमान में कर्नाटक का कोलर जिला) में जन्मे टीपू सुल्तान के पिता का नाम हैदर अली था।वह बहादुर और रण चातुर्य में दक्ष थे. टीपू ईस्ट इंडिया कंपनी के सामने कभी नहीं झुके और अंग्रेजों से जमकर संघर्ष किया।मैसूर की दूसरी लड़ाई में अंग्रेजों को शिकस्त देने में उन्होंने अपने पिता हैदर अली की काफी मददकी उन्होंने अंग्रेजों ही नहीं बल्कि निजामों को भी धूल चटाई. अपनी हार से बौखलाए हैदराबाद के निजाम ने टीपू से गद्दारी की और अंग्रेजों से मिल गया। मैसूर की तीसरी लड़ाई में जब अंग्रेज टीपू कोनहीं हरा पाए तो उन्होंने टीपू के साथ मेंगलूर संधि की लेकिन इसके बावजूद अंग्रेजों ने उन्हें धोखा दिया।ईस्ट इंडिया कंपनी ने हैदराबाद के निजाम से मिलकर चौथी बार टीपू पर भीषण हमला कर दिया और आखिरकार चार मई 1799 को श्रीरंगपट्टनम की रक्षा करते हुए मैसूर का यह शेर शहीद हो गया।टीपू ने 1782 में अपने पिता के निधन के बाद मैसूर की कमान संभाली थी। उन्होंने सड़कों सिंचाई व्यवस्था और अन्य विकास कार्यों की झड़ी लगाकर अपने राज्य को समृद्ध क्षेत्र में तब्दील कर दिया था और यह व्यापार क्षेत्र में काफी आगे था। उन्होंने कावेरी नदी पर एक बांध की नींव रखी। इसी जगह पर आज कृष्णासागर बांध है।टीपू सुल्तान का कम से कम एक योगदान ऐसा है जो उन्हें इतिहास में एक अलग और पक्की जगह दिलाता है।टीपू के सांप्रदायिक होने या न होने पर बहस छिड़ी है. लेकिन उसके एक कारनामे को लेकर बहस की कोई गुंजाइश नहीं है।असल में टीपू और उनके पिता हैदर अली ने दक्षिण भारत में दबदबे की लड़ाई में अक्सर रॉकेट का इस्तेमाल किया। ये रॉकेट उन्हें ज्यादा कामयाबी दिला पाए हों ऐसा लगता नहीं। लेकिन ये दुश्मन में खलबली ज़रूर फैलाते थे। उन्होंने जिन रॉकेट का इस्तेमाल किया वो बेहद छोटे लेकिन मारक थे। इनमें प्रोपेलेंट को रखने के लिए लोहे की नलियों का इस्तेमाल होता था। ये ट्यूब तलवारों से जुड़ी होती थी। ये रॉकेट करीब दो किलोमीटर तक मार कर सकते थे।माना जाता है कि पोल्लिलोर की लड़ाई (आज के तमिलनाडु का कांचीपुरम) में इन रॉकेट ने ही खेल बदलकर रख दिया था। 1780 में हुई इस लड़ाई में एक रॉकेट शायद अंग्रेज़ों की बारूद गाड़ी में जा टकराया था। अंग्रेज़ ये युद्ध हार गए थे।टीपू के इसी रॉकेट में सुधार कर अंग्रेज़ों ने उसका इस्तेमाल नेपोलियन के ख़िलाफ़ किया। हालांकि ये रॉकेट अमरीकियों के ख़िलाफ़ युद्ध मेंकमाल नहीं दिखा सका, क्योंकि अमरीकियों को किलेबंदी कर रॉकेट से निपटने का गुर आता था। 19वीं सदी के अंत में बंदूक में सुधार की वजह से रॉकेट एक बार फिर चलन से बाहर हो गया। 1930 के दशकमें गोडार्ड ने रॉकेट में तरल ईंधन का इस्तेमाल किया।लेकिन भारत की धरती पर रॉकेट तभी वापस आया जब 60 के दशक में विक्रम साराभाई ने भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम शुरू किया।#तीसरी जंग
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